ब्रज किशोर प्रसाद : स्वाधीनता संग्राम के महान सेनानी और गांधीजी के प्रिय ‘जेंटल बिहारी’
भारत के स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में अनेक ऐसे महान व्यक्तित्व हुए हैं, जिन्होंने अपने त्याग, समर्पण और संघर्ष से देश को आजादी की राह दिखाई। ऐसे ही महान स्वतंत्रता सेनानियों में एक प्रमुख नाम है ब्रज किशोर प्रसाद का, जिन्होंने न केवल बिहार बल्कि पूरे देश में राष्ट्रीय चेतना जागृत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
प्रारंभिक जीवन एवं शिक्षा
ब्रज किशोर प्रसाद का जन्म वर्ष 1877 में बिहार के श्रीनगर में एक प्रतिष्ठित कायस्थ परिवार में हुआ था। उनकी प्रारंभिक शिक्षा छपरा और पटना में हुई। इसके बाद उन्होंने उच्च शिक्षा के लिए प्रेसीडेंसी कॉलेज में प्रवेश लिया, जहाँ से उन्होंने विधि (कानून) की शिक्षा प्राप्त की। शिक्षा पूर्ण करने के बाद उन्होंने दरभंगा में सफल वकालत प्रारंभ की और शीघ्र ही एक प्रतिष्ठित अधिवक्ता के रूप में पहचान बनाई।
परिवार और सामाजिक विरासत
ब्रज किशोर प्रसाद का विवाह फूल देवी से हुआ था। उनके दो पुत्र विश्वनाथ प्रसाद और शिवनाथ प्रसाद तथा दो पुत्रियाँ प्रभावती देवी और विद्यावती देवी थीं।
उनकी पुत्री प्रभावती देवी का विवाह भारत के महान समाजवादी नेता जयप्रकाश नारायण से हुआ था। वहीं दूसरी पुत्री विद्यावती देवी का संबंध भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के परिवार से जुड़ा था, जिससे उनका परिवार राष्ट्रीय आंदोलन की प्रमुख धारा से और अधिक निकट हो गया।
गांधीजी से मुलाकात और स्वतंत्रता संग्राम में प्रवेश
सन् 1915 में ब्रज किशोर प्रसाद की मुलाकात महात्मा गांधी से हुई। गांधीजी के विचारों और राष्ट्रसेवा के प्रति उनके समर्पण ने ब्रज किशोर प्रसाद को गहराई से प्रभावित किया। इसके बाद उन्होंने अपनी सफल वकालत छोड़कर पूरी तरह स्वतंत्रता आंदोलन में स्वयं को समर्पित कर दिया।
उन्होंने गांधीजी के नेतृत्व में चलाए गए ऐतिहासिक चंपारण सत्याग्रह और खेड़ा सत्याग्रह में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। बिहार में किसानों की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर तक पहुंचाने और आंदोलन को संगठित करने में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण रहा।
गांधीजी के ‘जेंटल बिहारी’
ब्रज किशोर प्रसाद की सादगी, ईमानदारी और समर्पण से गांधीजी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने अपनी प्रसिद्ध आत्मकथा The Story of My Experiments with Truth में उनके व्यक्तित्व पर “The Gentle Bihari” शीर्षक से एक विशेष अध्याय लिखा। यह सम्मान बहुत कम लोगों को प्राप्त हुआ और यह उनके महान व्यक्तित्व का प्रमाण है।
बिहार विद्यापीठ की स्थापना में योगदान
राष्ट्रीय शिक्षा को बढ़ावा देने के उद्देश्य से स्थापित बिहार विद्यापीठ की स्थापना में भी ब्रज किशोर प्रसाद ने महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का आधार मानते हुए युवाओं को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ने का कार्य किया।
अंतिम समय और विरासत
अपने जीवन के अंतिम वर्षों में वे गंभीर रूप से अस्वस्थ रहे, लेकिन राष्ट्रसेवा के प्रति उनका समर्पण कभी कम नहीं हुआ। वर्ष 1946 में, देश की स्वतंत्रता से एक वर्ष पूर्व, उनका निधन हो गया। हालांकि वे स्वतंत्र भारत का सूर्योदय नहीं देख सके, लेकिन उनके संघर्ष और बलिदान ने आजादी की नींव को मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
निष्कर्ष
ब्रज किशोर प्रसाद उन महान स्वतंत्रता सेनानियों में से थे जिन्होंने व्यक्तिगत सुख-सुविधाओं और सफल करियर का त्याग कर राष्ट्रहित को सर्वोपरि माना। उनका जीवन त्याग, सेवा और राष्ट्रभक्ति का अनुपम उदाहरण है। आज भी उनका योगदान भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में अंकित है और आने वाली पीढ़ियों को राष्ट्रसेवा के लिए प्रेरित करता रहेगा।
