विकास किसका, कीमत किसकी?-देश की तरक्की और संसाधनों पर उठते गंभीर सवाल- पी.एस.मलतीयार
मनेंद्रगढ़। विकास किसी भी देश की प्रगति का आधार है, लेकिन जब विकास के साथ प्रकृति, जनता और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की कीमत जुड़ जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है। आज देश में विकास के मॉडल, सार्वजनिक संपत्तियों के निजीकरण और प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर एक गंभीर बहस सामने है।
अक्सर यह दावा किया जाता है कि भारत के विकास मॉडल को लेकर जिस तरह की चर्चाएं होती हैं, वैसी ही किसी योजना को चीन में इस आशंका के चलते स्वीकार नहीं किया गया कि विकास का लाभ किसी एक व्यक्ति या समूह के अत्यधिक सशक्त होने तक सीमित न रह जाए। हालांकि, ऐसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है। लेकिन इस बहस का मूल सवाल इससे कहीं बड़ा है—विकास का वास्तविक लाभ किसे मिल रहा है और उसकी कीमत कौन चुका रहा है?
देश में बंदरगाहों, हवाई अड्डों, बिजली परियोजनाओं, कोयला और खनिज संसाधनों से लेकर जमीन और अन्य सार्वजनिक परिसंपत्तियों तक निजी क्षेत्र की भागीदारी लगातार बढ़ी है। समर्थकों का तर्क है कि इससे निवेश, रोजगार और बुनियादी ढांचे को गति मिलती है। वहीं आलोचकों की चिंता है कि महत्वपूर्ण राष्ट्रीय संसाधनों और परिसंपत्तियों का अत्यधिक संकेंद्रण आर्थिक असमानता और सार्वजनिक हित से जुड़े सवाल पैदा कर सकता है।
दूसरी ओर, खनन और बड़ी परियोजनाओं से जुड़े क्षेत्रों में जंगलों की कटाई, पर्यावरणीय क्षति, जलस्रोतों पर दबाव, गांवों के विस्थापन और आदिवासी समुदायों के अधिकारों को लेकर भी लगातार सवाल उठते रहे हैं।
यह बहस किसी एक उद्योगपति या किसी एक कारोबारी समूह के अमीर बनने तक सीमित नहीं होनी चाहिए। असली सवाल व्यवस्था और नीति का है।
क्या विकास का मतलब केवल बड़े प्रोजेक्ट और बढ़ते निवेश हैं?
या फिर विकास का पैमाना यह भी होना चाहिए कि आम नागरिक का जीवन कितना बेहतर हुआ, स्थानीय लोगों को कितने अवसर मिले, पर्यावरण कितना सुरक्षित रहा और विस्थापित परिवारों का पुनर्वास कितना न्यायपूर्ण हुआ?
लोकतंत्र में सत्ता और उद्योग जगत के बीच सहयोग आर्थिक विकास को गति दे सकता है, लेकिन इस साझेदारी के साथ पारदर्शिता, जवाबदेही और सार्वजनिक हित की सुरक्षा भी उतनी ही जरूरी है।
इसलिए आज सवाल पूछना जरूरी है
देश किसकेलिए विकसित हो रहा है? विकास की कीमत कौन चुका रहा है? प्राकृतिक संसाधनों पर पहला अधिकार किसका होना चाहिए?
और विकास का सबसे बड़ा लाभ आखिर किसे मिल रहा है?
विकास जरूरी है, उद्योग जरूरी हैं, निवेश जरूरी है-लेकिन जल, जंगल, जमीन और जनता की कीमत पर विकास की अवधारणा पर सवाल उठना भी उतना ही जरूरी है।
किसी व्यक्ति या कंपनी की आर्थिक सफलता को देश की सफलता तभी माना जा सकता है, जब उस सफलता का लाभ व्यापक समाज तक पहुंचे और उसके लिए प्रकृति तथा आम नागरिकों को असमान कीमत न चुकानी पड़े।
आखिर सवाल सीधा है-देश पहले या कॉरपोरेट मुनाफा पहले?
लोकतंत्र में इसका जवाब किसी एक व्यक्ति या संस्था के पास नहीं, बल्कि जनता के सवालों, पारदर्शी नीतियों और जवाबदेह व्यवस्था के पास होना चाहिए।


