प्राकृतिक रहस्य का एक और पन्ना…छत्तीसगढ़ का तातापानी
पर्यावरण एवं पर्यटन अंक- 49 बीरेद्र श्रीवास्तव की कलम से
विशेष आलेख।प्रकृति के रहस्य को जानने की कोशिश विज्ञान का आधार रहा है जिससे हम इसके कई हिस्सों से परिचित हुए हैं लेकिन अभी भी प्रकृति के धरती और आकाश की कई घटनाएं अनजानी और अनसुलझी है। धरती पर रहते हुए भी हम इस धरती के पक्षों से अनजान है। इसी पृथ्वी पर रहने वाले अनेक कीट पतंगों के साथ-साथ अगणित कीर्मी के बारे में जानकारी अब तक अज्ञात है। जीवन का संचालन में कौन बैक्टीरिया शामिल है और कौन सा वायरस हमारी मृत्यु का कारण बनता है इसे खोजने की कोशिश भी अभी तक असफल साबित हुई है। पृथ्वी के आसपास पहले विशाल महासागर की अंतः गहराइयों में भी क्या-क्या भरा है इसका कुछ अंश ही हम अभी तक जान पाए हैं। इसकी गहराई में रहने वाले कवक का जीवन तथा पानी के इतने दबाव के बाद भी जीव जंतुओं का जीवित रहना भी एक प्राकृतिक पहेली के रहस्यों से भरा हुआ है। ब्रह्मांड के शून्य में व्याप्त पदार्थ और ब्लैक होल का अस्तित्व तथा समुद्र में स्थित बरमूडा त्रिकोण में पानी के बड़े जहाज का डूब जाना जैसे सवाल अभी भी हमारे ज्ञान विज्ञान की जानकारी पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं। इसी तरह पत्थरों के ऊंचे पहाड़ों से लगातार जल स्रोत की उत्पत्ति और ढलान से चढ़ाई की ओर पानी का बहाव, पत्थर की चट्टानों से मधुर संगीत की उत्पत्ति, कहीं-कहीं दबाव के साथ पानी की जलधारा का धरती की सतह से दो-तीन फुट उपर तक फौवारे के रूप में बाहर निकलना और इसी धरती के किसी स्थान पर गर्म खौलते पानी की धारा का निकलना, आज भी प्रकृति के आश्चर्य से कम नहीं है। पृथ्वी अपने जीव जंतुओं के जीवन को बचाए रखने के लिए समृद्ध जैव विविधता को प्राथमिकता देती है जिसके नष्ट होने या चरण होने पर पुनः उसकी मरम्मत या भरपाई की क्षमता धीरे-धीरे प्राकृतिक द्वारा विकसित होती रहती है वैज्ञानिक अनुसंधानों के अनुसार समुद्र की तलहटी में अब ऐसे बैक्टीरिया विकसित होने लगे हैं जो प्लास्टिक के टुकड़ों को दीमक की तरह नष्ट करने की क्षमता रखते हैं यह समय की मांग है कि हो सकता है आने वाले समय में पृथ्वी को नुकसान पहुंचाने वाला प्लास्टिक भी कागज और लकड़ी की तरह सड़कर समाप्त हो जाए। यह जैव विविधता का एक सशक्त उदाहरण बनेगा।
रहस्यों से भरी प्रकृति का एक पन्ना छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले में स्थित तातापानी है जहां जमीन के भीतर से गर्म उबलता पानी लगातार वर्ष भर निकलता रहता है। बलरामपुर जिला मुख्यालय से लगभग 10 किलोमीटर आगे गर्म पानी के निकलने और उड़ते भाप के कारण इस स्थान का नाम तातापानी अर्थात (गर्मपानी स्थल) रखा गया है। अंबिकापुर से रामानुजगंज जाने वाली राष्ट्रीय राजमार्ग 343 में बलरामपुर जिला मुख्यालय से 10 किलोमीटर आगे उत्तर पूर्व दिशा में मुख्य मार्ग से बांई ओर 100 मीटर मुड़ने पर तातापानी जाने के लिए दो स्वागत द्वार आपका स्वागत करते हैं। इसमें प्रवेश कर आगे आप लगभग 02 किलोमीटर की यात्रा करने के बाद तातापानी स्थल क्षेत्र में पहुंच जाते हैं। यहां पहुंचने के पूर्व ध्यानमग्न भगवान शिव की विशाल प्रतिमा के दर्शन होते हैं। प्राकृतिक फूल, पत्तियों और घास के मैदान सहित छोटे-छोटे तीन झील का एक सुंदर उद्यान परिसर मन को आकर्षित करता है। परिसर में प्रवेश करते ही बांई ओर पूजन सामग्री एवं नारियल के दुकानों की अतिरिक्त बच्चों के खिलौने भी रखे हुए हैं जहां से आप अपनी आस्था के अनुसार मंदिर या भगवान भोले शंकर को अर्पित करने के लिए पूजन सामग्री ले सकते हैं। झील के आसपास फूलों के पौधे और हरे भरे घास से भरा यह बगीचा कुछ देर अपने पास बैठने का आमंत्रण देता है। यहां का आध्यात्मिक वातावरण हरियाली और झीलों के बीच तैरती मछलियों के झुंड और पर्यटकों द्वारा उन्हें मुर्रा, लाई, खिलाते हुए देखकर समस्त जीव जंतुओं के रक्षक भगवान शिव की आस्था मन के भीतर तक उतर जाती है।
भगवान भोले शंकर की लगभग 80 फीट ऊंची प्रतिमा के पास पहुंचने के लिए नीचे से लगभग 35 सीढ़ियां चढ़कर ही आप उनका आशीर्वाद लेने के लिए उनके चरणों तक पहुंच सकते हैं। सैकड़ो श्रद्धालुओं का इस सीढ़ी से ऊपर चढ़ना और ऊपर पहुंचकर एक विजेता की तरह भोले बाबा के चरणों में खड़े होकर तस्वीर खिंचवाना यहां के प्रत्येक पर्यटक की प्राथमिकता में शामिल होता है। नीचे हाथ जोड़कर खड़े श्रद्धालु भोले बाबा की ऊंचाई की तस्वीर लेने में रुचि रखते हैं। इस विशाल प्रतिमा के दाहिने ओर एक प्राचीन शिव मंदिर स्थापित है इसे तपेश्वर महादेव मंदिर कहते हैं। यहां स्थापित मूर्ति के बारे में किवदंती है कि यह शिवलिंग लगभग 400 वर्ष पुरानी प्रतिमा है। कहा जाता है कि यहां भगवान शिव ने काफी वर्षों तक तपस्या की थी। इसीलिए इसका नाम तपेश्वर शिव मंदिर पड़ा। यह मंदिर उसी प्राचीन तपस्थली का हिस्सा है । प्राचीन मंदिर के कुछ पत्थर यहां वहां पेड़ों के नीचे दिखाई पड़ते हैं। इसी मंदिर के किनारे से बना एक रास्ता पर्यटकों को पीछे बने विशाल ज्योतिर्लिंग मंदिर संग्रहालय तक पहुंचाता है। ऊपर बनी शिव प्रतिमा के नीचे स्थित इस स्थान पर 100 फुट से ज्यादा लंबे चौड़े हाल में देश के विभिन्न स्थानों पर स्थापित 12 ज्योतिर्लिंगों की प्रतिमा यहां विराजमान है। यहां दीवारों पर लगे लगभग 8,× 4 फीट फ्रेम में इन सभी ज्योतिर्लिंग की अलग-अलग जानकारी उनके छायाचित्र के साथ दीवारों पर अंकित है जो हमें देश भर के ज्योतिर्लिंग की जानकारी देती है। इसी मजबूत कंक्रीट के स्तंभ पर ऊपर 80 फीट प्रतिमा का निर्माण किया गया है। इस विशाल परिसर में आयताकार मंच बनाकर अलग-अलग स्थलों पर द्वादश ज्योतिर्लिंग को छोटी-छोटी प्रतिमाओं को स्थापित किया गया है।
मंदिर के आसपास हिस्से में हिंडालको इंडस्ट्री द्वारा वर्ष 2020 में बच्चों के खेल का खेल बगीचा बनाकर घिसलपट्टी, झूले एवं गोल झूले भी लगा दिए गए हैं जो पर्यटकों के साथ आए बच्चों के मनोरंजन और उनकी थकान मिटाने का एक अच्छा स्थल साबित हो रहा है। यहां द्वादश शिवलिंग मंदिर के पीछे भी जिला प्रशासन द्वारा एक बगीचा विकसित करने का प्रयास किया जा रहा है लेकिन उसमें अब तक एक बोर्ड ही केवल लग पाया है। उम्मीद है यदि मन से निष्ठा पूर्वक प्रयास किया गया तब एक अच्छा उद्यान विकसित हो सकता है जिसकी यहां बहुत आवश्यकता है।
मंदिर प्रांगण से बाहर दो कुंड को लोहे की जाली से घेर दिया गया है जिसमें लगातार गर्म पानी जमीन के अंदर से निकलकर छोटे-छोटे बहाव के रास्ते से आगे बहने के लिए छोड़ दिया गया है। पर्यटकों की सुरक्षा के लिहाज से इस गर्म पानी के कुंड को लोहे की जाली से घेर दिया गया है। कम गर्म पानी का कुंड माता सीता कुंड एवं उससे ज्यादा गर्म पानी कुंड श्री राम कुंड कहलाता है। इस गर्म पानी के कुंड के पास गर्म पानी निकलने के आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक पक्ष को लेकर एक बोर्ड में लिखकर आम पर्यटकों के लिए प्रस्तुत किया गया है, जिसमें लिखा गया है कि यह मान्यता है कि भगवान शिव के पास पहुंचे देवी देवताओं द्वारा स्नान हेतु यहां देव शक्ति से पानी गर्म किया गया जो आज भी जमीन के भीतर से लगातार निकल रहा है। यहां के तपेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी जी के अनुसार यहां से कुछ दूरी पर स्थित रमपुरा पहाड़ी में भगवान राम का वनवास काल में आगमन हुआ था। इसी रामपुर पहाड़ी से भगवान राम द्वारा चलाया गया एक तीर यहां गर्म तेल के कड़ाही से टकरा गया जिससे निकले तेल के छींटे गर्म पानी के स्रोत बन गए हैं। यह किवदंती भगवान राम की वनवास यात्रा के दौरान दंडकारण्य के इस अंचल को भी उनकी यादों से जोड़ती है और आस्थावान श्रद्धालुओं को ऐसे पावन स्थलों से बांधे रखती है। यहां से कुछ दूरी पर एक तीसरा जलकुंड ठंडे पानी के बहते हुए नाले के दूसरी तरफ जाने पर मिला। यहां पानी का तापमान लगभग 95 से 100 डिग्री सेंटीग्रेड की गर्मी से उबल रहा था। इस स्थान पर भी तार से घेर कर लोगों की पहुंच को रोकने की कोशिश की गई है ताकि कोई दुर्घटना ना हो जाए, क्योंकि नाला पार करते समय हमें गर्म पानी के नाले में मरे हुए सांप और मेंढक दिखाई दिए। राम सीता कुंड की अपेक्षा यह कुंड काफी बड़ा और ज्यादा गर्म उबलते पानी की वजह से आसपास भाप उठ रही है। रामकुंड और सीता कुंड में अंडे या चावल उबालने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है ताकि इस स्थल की पवित्रता श्रद्धालुओं के लिए बनी रहे।
वैज्ञानिक तथ्यों के अनुसार इस क्षेत्र के भूगर्भ में स्थित गंधक विद्यमान होने के कारण पानी गर्म हो रहा है। इसी गंधक के कारण इस पानी का उपयोग चर्म रोगों की चिकित्सा में उपयोगी है। यह भी जानकारी मिलती है की भूमि के भीतर टेक्टोनिक प्लेट में फाल्ट अर्थात दरारें आ जाने के कारण भूगर्भीय गर्मी बाहर आ रही है जो ऊपरी सतह पर निकलने वाले पानी को गर्म कर देती है। यहां अलग-अलग स्थलों पर निकलने वाले पानी का तापमान 50 डिग्री स सेंटीग्रेड से लेकर 97 डिग्री सेंटीग्रेड तक पाया गया है तथा साल के बारहों भाप हवा में उड़ती रहती है। पानी का यह तापमान अपने क्वथनांक (बायलिंग पॉइंट) पर होने के कारण इसमें चावल पकाया जा सकता है। वर्ष 2013 में क्रेडा के वैज्ञानिकों ने तातापानी मे जियोथर्मल पावर प्रोजेक्ट के लिए एक प्रस्ताव दिया था लेकिन अभी तक वह क्रियान्वित नहीं हो पाया है। एक अध्ययन के अनुसार देश भर के जम्मू कश्मीर, हिमाचल, मुंबई एवं गुजरात के गोदावरी बेसिन में प्राप्त गर्म पानी के स्रोत की अपेक्षा तातापानी में पाया गया पानी ज्यादा गर्म होने के कारण जियोथर्मल पावर प्रोजेक्ट के लिए अनुकूल पाया गया है। प्रारंभिक जानकारी में क्रेडा ( छत्तीसगढ़ राज्य अक्षय ऊर्जा विकास एजेंसी) एवं अन्य विभागों द्वारा अब तक किए गए 26 बोर होल में से पांच बोर होल में पानी का तापमान 104 डिग्री सेंटीग्रेड से 109 डिग्री सेंटीग्रेड तक पाया गया है सोन, नर्मदा एवं ताप्ती नदी के मध्य स्थित होने के कारण तातापानी के गर्म जल स्रोत को सोनाटा नाम से भी जाना जाता है। इसके भीतरी परतों में 200 डिग्री सेंटीग्रेड तक गर्म होना बताया गया है जो किसी भी जियोथर्मल पावर प्रोजेक्ट के लिए पूरी तरह अनुकूल है। इस तरह के गर्म पानी के स्रोतों पर कई देशों में जियोथर्मल प्लांट से विद्युत पैदा की जा रही है। यहां बोरिंग सहित कुछ प्रारंभिक जांच के उपकरण यहां वहां दिखाई देते हैं लेकिन अभी तक यहां जियोथर्मल पावर प्रोजेक्ट दूर की कौड़ी साबित हो रही है।
वैकल्पिक ऊर्जा के असीम संभावनाओं का यह क्षेत्र वैज्ञानिक और आध्यात्मिक मान्यताओं से परिपूर्ण है इस स्थल पर आसपास के श्रद्धालुओं सहित पर्यटकों का आना-जाना लगा रहता है। खेती किसानी समाप्ति के बाद आने वाला पहला पर्व मकर संक्रांति को यहां तीन दिवसीय मेला लगता है जिसमें आसपास के ग्राम वासियों के आगमन के साथ एक समृद्ध बाजार और मनोरंजन के समान यहां दिखाई पड़ता हैं। अपनी विशिष्ट जैव विविधता का यह स्थल साल वनों की सतपुड़ा श्रृंखला का ही एक हिस्सा है लेकिन आसपास के जंगलों का कटाव इसे वीरान शब्द की परिभाषा में धीरे-धीरे ढकेल रहा है। यही पास में एक और शिव मंदिर के निर्माण का ढांचा दिखाई देता है जो यहां के आध्यात्मिक परंपरा को और आगे ले जाने की इच्छा से बनाया जा रहा है। अपनी आध्यात्मिक आस्था के साथ आसपास के ग्रामवासी कम गर्म पानी अपने बोतल में भरकर घर ले जाते हैं, जिसका उपयोग उनकी आस्था और शरीर के प्रतिरोधक शक्ति को उत्प्रेरित करती है।
इसी के बल पर स्वस्थ होने वाले ग्रामीण इसे ईश्वर का आशीर्वाद मानते हैं और भगवान शंकर के मंदिर में पुनः आशीर्वाद लेने के लिए आते हैं। श्रद्धा और आस्था का यह सूत्र हमारे समाज की एक ऐसी मजबूत कड़ी है जो हमें ईश्वरीय आस्था से बांधे रखती है और ऐसे स्थलों की सुरक्षा एवं जुड़ाव हेतु सामाजिक संरचना का निर्माण करती है।
अंबिकापुर से बलरामपुर की यात्रा के बीच लगभग 60 किलोमीटर की यात्रा के बीच कुलाचें भरते हिरनो के झुंड और सेमरसोत वन्य जीव अभ्यारण की वादियों का सौंदर्य अपनी समृद्ध जैव विविधता और वन्य जीवों के संरक्षण स्थल होने के कारण हमें आकर्षित करता है, किंतु राष्ट्रीय राजमार्ग 343 के चौड़ीकरण विकास के लिए सड़कों के किनारे हजारों लाखों पेड़ों के ठूंठ का दर्द शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता। विशाल वनो के विनाश और विकास की इस परिभाषा को हमें समझना होगा और समय रहते इसके लिए सशक्त विकल्प तलाशना होगा। सैकड़ो वर्षों के यह वृक्ष हमसे बार-बार यही कह रहे हैं कि आगामी पांच पीढ़ी के हिस्से की प्राण वायु और समृद्ध जैव विविधता की समाप्ति के लिए तुम्हें किसने अधिकार दिया है, क्या हमने मानव को भोजन और वायु देकर अपने नष्ट होने की इबारत लिख दी है? ऐसे प्रश्न हमें आहत करते हैं और पुनर्विचार के लिए प्रेरित करते हैं।
अंबिकापुर से लगभग 90 किलोमीटर दूर बलरामपुर जिला मुख्यालय तक सघन वनों का सौंदर्य और बलरामपुर से लगभग 10 किलोमीटर दूर स्थित तातापानी का सुरम्य वातावरण में आपको गर्म पानी के झरने की अनुभूतियों से जोड़ने और अपनी संवेदनाओं में बांधने के लिए आमंत्रित कर रहा है। देश के गिने-चुने प्राकृतिक रहस्यों में से एक तातापानी को जानने के लिए उत्तरी छत्तीसगढ़ के बलरामपुर जिले के गर्म पानी के विशेष कुंड की यह यात्रा आपके पर्यटन को और ज्यादा रोमांचक और संवेदनशील बना देगी, ऐसा हमारा विश्वास है।
बस इतना ही फिर मिलेंगे किसी अगले पड़ाव पर
राजेश सिन्हा,8319654988









