अबूझ सभ्यता के सांस्कृतिक इतिहास की गवाह है…. डीपाडीह की मूर्तियां
पर्यावरण एवं पर्यटन अंक – 48 बीरेन्द्र श्रीवास्तव की कलम से
मिट्टी की परतों में जाने क्या क्या दबा हुआ।
कुछ इतिहास के पन्ने हैं कुछ बिखरी सभ्यता।।
विशेष आलेख।जी हां, पत्थरों की भी अपनी भाषा होती है लेकिन इसे पढ़ने के लिए आपको इसका कौशल जानना जरूरी है। समय के साथ साथ इतिहास संस्कृति और मानव विकास की कहानी अपने अंतस में समेटे यहां के बिखरे पत्थर बहुत कुछ कहते हैं, लेकिन इनकी मूक भाषा पढ़ने के लिए हमें इनके पास जाना होता है। मिट्टी के नीचे दबी की डीपाडीह पहाड़ियां इसी तरह जाने कितने वर्षों से एक अबूझ कहानी अपने मन में छुपाए रखे हुए हैं। गांव के बाहरी छोर पर गलफुला नदी के किनारे एक ध्वस्त मंदिर के निशान यहां के ग्रामीणों को रहस्यमई लगती थी। इस टीले की ऊपरी मिट्टी जब भारी बरसात के बाद बह गई तब उसके ऊपर भगवान शिव के नदी की एक प्रतिमा दिखाई पड़ी जो आसपास के निवासियों के लिए रहस्य और रोमांच का स्थल साबित हुआ
आंचलिक भाषा सरगुजिया में मिट्टी के किसी ऊंचे टीले को डीह कहा जाता है जो गांव के बाहर या बीच में भी हो सकता है। इस गांव के रक्षक देवी देवता का स्थान माना जाता है कहीं-कहीं डीह बाबा कहकर उनकी पूजा भी की जाती है। इसका कारण संभवत किसी अदृश्य शक्ति या सभ्यता का स्थल होना बताया जाता है। इस गांव में ऊंची पहाड़ीनुमा डीह में एक दबी हुई सभ्यता के कारण इसे डीपाडीह कहा गया। कई और किवदंतिया इस नाम को लेकर यहां प्रचलित है जिसमें भगवान राम के प्रति आस्था और वनगमन मार्ग होने के कारण ग्रामीणों का मानना है कि भगवान राम का यहां लंबे समय तक पड़ाव स्थल रहा है। उनके जाने के बाद भी उनके सानिध्य की यादों को बनाए रखने के लिए प्रतीक स्वरुप एक अखंड दीप कई वर्षों तक ग्रामीणों द्वारा जलाया जाता रहा। इस कारण इस गांव का नाम डीपाडीह पड़ा। जो अब डीपाडीह कला के नाम से जाना जाता है।
अंबिकापुर संभाग से लगभग 75 किलोमीटर की दूरी पर स्थित डीपाडीह कला अब छत्तीसगढ़ के नए जिले बलरामपुर- रामानुजगंज का एक कस्बा है जो अंबिकापुर से शंकरगढ़ कुसमी मार्ग पर स्थित है। अंबिकापुर से 35 किलोमीटर दूर राजपुर पहुंचने के बाद उत्तर पूर्व दिशा में लगभग 38 किलोमीटर की यात्रा पूर्ण कर आप डीपाडीह पहुंचते हैं। यहां भैया थान और प्रतापपुर मार्ग से भी राजपुर तक पहुंचा जा सकता है। यहां के ग्रामीणों का कहना है कि 1987-88 में तत्कालीन कलेक्टर के कुसमी दौरे के बीच यहां के ग्रामीणों ने इस डीह के नीचे मंदिर होने की जानकारी कलेक्टर को दी। यह स्थल झारखंड की सीमा से जुड़े होने के कारण नक्सलियों का आवागमन का क्षेत्र भी था। इसलिए यहां पर कलेक्टर का आना-जाना लगा रहता था। कलेक्टर के स्थल निरीक्षण पर मूर्तियों के अंश को देखकर पुरातात्विक खुदाई की स्वीकृति प्रदान की गई। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की कई वर्षों तक खुदाई के बाद इस स्थल को आठवीं सदी से लेकर 12वीं सदी तक की मूर्तियों की जानकारी मिली। विशाल मूर्तियों के दबे हुए अवशेष की उपस्थिति से हम पत्थरों के नीचे दबी सैकड़ो वर्ष पुरानी समृद्ध सांस्कृतिक सभ्यता की जानकारी परिचित हुए।
यह मंदिर यहां किसने बनवाया यह कितने वर्ष पुराना है, इन सब प्रश्नों का उत्तर यहां पर स्थित मूर्तियां बताती है। ऐतिहासिक जानकारी के अनुसार उत्तर भारत के तीर्थ यात्रियों को जगन्नाथ पुरी जाने का यह मुख्य मार्ग था। ऐसा प्रतीत होता है कि उस समय के किसी राजा के द्वारा इस मंदिर का निर्माण कराया गया होगा। क्योंकि डीपाडीह का सामत- सरना नाम का यह स्थल पुरातात्विक खुदाई के बाद अपने स्पष्ट रूप में सामने आया। खुदाई के बाद इस स्थल पर कई देवी देवताओं के अलग-अलग मंदिरों के समूह प्राप्त हुए हैं जो इसे एक तीर्थ स्थल के रूप में भी मान्यता की संभावना को इंगित करता है। इस स्थल पर शैव, शाक्य मतावलंबियों की मूर्तियां खुदाई में प्राप्त हुई है। यह क्षेत्र आठवीं सदी से लेकर 18 वीं सदी तक कल्चुरी राजाओं का शक्तिशाली साम्राज्य का हिस्सा रहा है। त्रिपुरी राजाओं का दूसरा हिस्सा जो रतनपुर छत्तीसगढ़ से अपना शासन चला रहे थे उसका विस्तार इस क्षेत्र में रहा है। कलचुरी राजा शैव धर्म के अनुयाई थे। अपनी सांस्कृतिक एवं वास्तु कला के लिए प्रसिद्ध यह हैहयवंशी कलचुरी वंश स्वयं को अर्जुन के वंशज कहते थे। अपने समय में धार्मिक रूप से सहिष्णु होने के साथ इन्होंने वैष्णव, जैन एवं बौद्ध धर्म को भी संरक्षण दिया था। इसलिए ऐसा माना जाता है कि ओम नमः शिवाय से अपने अभिलेख प्रारंभ करने वाले कलचुरी राजाओं के संरक्षण का यह कोई प्रसिद्ध स्थल भी हो सकता है यहां की मूर्तियां भी यही कहानी सुनाती है।
इस पुरातात्विक यात्रा में हमारे साथ आज आदिवासी समाज के अध्यक्ष परमेश्वर सिंह की उपस्थिति हमें ग्रामीणों से बातचीत करने में सहायता पहुंचा रही है। स्थानीय सरगुजिया बोली में गांव के लोग अपनत्व के साथ हमें जानकारी देते हैं। डीपाडीह में स्थित मंदिरों के इस समूह को सामत- सरना कहा जाता है। मंदिर में लिखे बोर्ड से पता चलता है कि यह स्थल गलफुला नदी के किनारे स्थित है और 1 किलोमीटर के क्षेत्र में फैले कई मंदिरों के अवशेष यहां बिखरे पड़े हैं। कहते हैं कि यहां टांगी नाथ और सामंत राजा के मध्य युद्ध हुआ था जिसमें राजा वीरगति को प्राप्त हुए और उनकी मृत्यु के पश्चात उनकी रानियां बावली में कूद कर जौहर के अनुसार अपने प्राण त्याग दिए। इसलिए इस स्थान का नाम सामत सरना कहलाया। इन भग्न मंदिरों को 1987 से कई वर्षों तक उत्खनन कर अनावृत किया गया। यहां उत्खनन में शैव, वैष्णव धर्म के अवशेष प्राप्त हुए हैं। यहां के शिल्प कला में सौंदर्य, भावाविभक्ति और मौलिकता का संतुलित प्रवाह है, जो इसे आठवीं सदी से 12वीं सदी के शिल्प कला एवं धार्मिक परंपराओं से परिचित कराती है।
आम्रकुंज से घिरे डीपाडीह का सामत- सरना पुरातात्विक स्थल एक लंबी चारदीवारी से घर घिरा हुआ क्षेत्र है जो अलग-अलग हिस्सों में फैला है प्रवेश द्वार से प्रवेश करते ही हमारा स्वागत यहां के प्रभारी जगदीश राम जी की मुलाकात से होती है जो हमें हमारी कार का नंबर, हमारा नाम, पता एवं फोन नंबर यहां रखे हुए आगंतुक पंजी में दर्ज करते हैं। जानकारी लेने पर वह बताते हैं कि पत्थरों की यह मूर्तियां जो उत्खनन से प्राप्त हुई है पुरातात्विक महत्व की मूर्तियां है। कुछ अवांछित तत्वों द्वारा उनकी चोरी कर बाहर भेजने की धारणा इसे नुकसान पहुंचाती है। उन्होंने जानकारी दी कि वर्ष 2003 में कुछ पर्यटक यहां ऐसे भी आए थे जिन्होंने यहां के चौकीदार तेजू राम को स्थल भ्रमण के लिए अपने साथ दूर तक ले गए और उनके साथी गाड़ी में यही रह गए। इसी बीच उनके साथी बेश कीमती मूर्तियों को चोरी कर गाड़ी में लाद लिया। विरोध करने पर तेजू राम को अपने साथ बंधक बनाकर गाड़ी में लाद दिया और लगभग 8-10 किलोमीटर आगे सेमरसोत के जंगलों में 17 फुट खाई के ऊपर पेड़ से झूला दिया। उसके बाद से प्रशासन चौकन्नी हो गई। अब यहां तीन चौकीदार की नियुक्ति इसकी सुरक्षा के लिए कर दी गई है। हमें प्रत्येक पर्यटकों की जानकारी दर्ज करने की जिम्मेदारी भी दी गई है। जगदीश राम केवल रक्षक ही नहीं एक गाइड का भी दायित्व निभाते हैं। कुछ विशिष्ट स्थलों की जानकारी प्रदान करते हुए उन्होंने बताया कि इस पुरातात्विक धरोहर स्थल पर विदेशी पर्यटक भी यहां आ चुके हैं। यहां फ्रांस एवं जर्मनी के जिज्ञासु पर्यटकों से उनकी भी मुलाकात हुई है।
सामत- सरना के प्रवेश द्वार के दाहिनी तरफ म्यूजियम जैसे भवन में उत्खनन से प्राप्त मूर्तियों को सहेज कर रखा गया है। जिसमें सामने भगवान गणेश, विष्णु, उमा – महेश्वर, चामुंडा काली एवं द्वारपाल की मूर्तियां रखी गई है। इसके पीछे बने तीन हाल में छोटी मूर्तियां जिसमें शिवलिंग एवं जलहरी, आम्रकलश एवं सिंहासन को संभाले पुतलियां और मुखोटे तथा दो शरीर वाले शेर की छोटी लेकिन फाइन पत्थरों की मूर्तियों को सहेज कर रखा गया है। यह सब मूर्तियां नए उत्खनन स्थल से प्राप्त हुई है। इसमें से कई मूर्तियां टूट गई है किंतु मूर्तियों की कारीगरी और बारीकियां को पुरातात्विक पर्यटकों के समक्ष समझने के लिए इसे यहां संजोकर रखा गया है।
लगभग एक वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले मंदिरों के समूह को चार भागों में बांटा जा सकता है। सामत-सरना, बिरजा टोला, रानी पोखर और उरांव टोला। प्रवेश द्वार के सामने पुरातत्व वैज्ञानिकों ने पत्थरों के चौकोर स्तंभ बनाकर यहां उत्खनन से प्राप्त मूर्तियों को मार्ग के दोनों ओर स्थापित कर उसके नीचे काल गणना का विवरण लिख दिया है ताकि आने वाले पर्यटकों को मूर्ति एवं काल की सही जानकारी मिल सके। इसमें दसवीं सदी का शार्दुल, नवमी सदी के गवाक्ष (जो महलों में हवा एवं रोशनी के लिए लगाए जाते हैं) इन गवाक्ष में बौद्ध मूर्तियों की झलक दिखाई पड़ती है। दसवीं सदी की उमा-महेश्वर, की मूर्तियां भी यहां स्थापित की गई है जिसके नीचे एक फरसा भी बना हुआ है जो टांगीनाथ अर्थात परशुराम का शस्त्र कहा जाता है।
सामत सरना परिसर में कई अलग-अलग मंदिरों के समूह है जिसमें विष्णु मंदिर, शिव मंदिर एवं मां काली का मंदिर प्रमुख है। भगवान विष्णु मंदिर के मुख्य द्वार पर भगवान विष्णु के पूर्व अवतारों का चित्रण किया गया है जिसमें वराह, वामन अवतार की मूर्तियां उकेरी गई है । वामन अवतार में भगवान अपना छत्र लिए हुए दिखाए गए हैं। यह इस उत्खनन की सबसे समृद्ध मूर्तियां हैं। इसी तरह भगवान शिव का शतकोणीय आधार पर स्थापित शिवलिंग तत्कालीन मूर्ति कला को प्रदर्शित करता है। यहां पर गंगा जमुना को कलश लिए द्वार पर दर्शाया गया है। इन्हीं मंदिरों के पास कुछ स्तंभ ऐसे भी मिले हैं जिसमें कार्तिकेय अपने वाहन मोर पर सवार है। कुछ स्तंभ में इतनी बारीक कारीगरी की गई है जिसे देखकर आप स्तब्ध रह जाएंगे। यहां स्थित मां काली का मंडप पंचानन मंदिर कहलाता है जिसमें केंद्र में एक मंदिर मां काली का एवं चार मंदिर इसके चारों कोने में भगवान शिव के मंदिर है। यहां शिव मंदिर के प्रवेश द्वार पर द्वारपाल, भगवान गणेश, कार्तिकेय एवं 16 भुजाओं वाले भगवान विष्णु की मूर्ति भी तराशी गई है। इसी प्रकार चौथी तरफ महिषासुर मर्दिनी नवदुर्गा तथा मुंड माल पहने मां काली की प्रतिमा स्थापित की गई है। इसी मंदिर के उत्तर दिशा में बावली बनी हुई है जहां राजा सामंत की मृत्यु के बाद रानियां ने जौहर कर अपने प्राण त्याग दिए थे।
मंदिर का दूसरा समूह कुछ दूरी पर बिरजा टीला नाम से जाना जाता है। इसमें सूर्य देवता पर केंद्रित मूर्तियां रखी गई है। कुछ मठ जैसी संरचना भी यहां पाई गई है जो यहां के आवासीय परिसर की जानकारी देते हैं। यहां से प्राप्त अधिकांश मूर्तियां टूट गई है। तीसरे समूह रानी पोखर मंदिर का समूह है जो सामत सरना से उत्तर दिशा में स्थित है और लगभग डेढ़- दो एकड़ क्षेत्र में फैला हुआ है । यहां के मंदिर में अब तक केवल चबूतरे शेष रह गए हैं एवं साफ सफाई की कमी के कारण घास-पात में दब गए हैं। चौथे समूह उरांव टोला मंदिर कहलाता है जो आठवीं सदी के निर्माण कला के शिल्प से भरा है। यहां के स्तंभ में देव प्रतिमा, मिथुन युगल मूर्तियों एवं नायिकाओं की मूर्तियां भी अंकित की गई है। यहां की मंदिर शैली
तीन रथ, पंचानन मंदिर के स्वरूप में है। इन्हें मजबूत आधार मंच पर निर्मित किया गया हैं । कई मंदिर पंचानन पद्धति पर बने हैं जिसके मध्य में बने केंद्रित मंदिर के चारों तरफ चार छोटे मंदिरों का निर्माण भी होता है यहां का काली मंदिर इसी शैली पर बनाया गया है।
यहां पर बने मंदिरों के मंच स्थल की नींव आज खुदाई के बाद भी हजारों साल बीतने के बाद यथावत है, केवल मूर्तियां को यहां वहां स्थापित किया गया है। बातचीत में हमें जानकारी मिली कि यहां से आगे शंकरगढ़ के उत्तर में एक मंदिर है जो हर्राटोला शिव मंदिर कहलाता है। उस मंदिर में भी इसी तरह के मूर्तियां स्थापित है। इस स्थल के पश्चिम में कनहर नदी बहती है। नदी को पार कर गम्हारडीह गांव में एक मंदिर स्थापित है जिसमें इसी क्षेत्र की मूर्तियां स्थापित है। इस मंदिर से लगभग 3 किलोमीटर आगे एक सुरंग है जो आगे कहां जाकर निकलता है यह अब तक का अज्ञात है और खोज का विषय है। कनहर नदी पार करने के बाद झारखंड राज्य की सीमाएं प्रारंभ हो जाती है।
मूर्तियों का उत्खनन एवं मंदिरों की स्थापना का लगभग 05 एकड़ क्षेत्र में फैले इस स्थल में कई मंदिरों के ध्वंसावशेष है जो कई अनजान रहस्य को समेटे हुए हैं। सोमवंशी, पालवंशी और कलचुरी राजाओं के समय काल की मूर्तियों का समूह उस समय का कोई तीर्थ स्थल भी हो सकता है। इसकी संभावना भी हो सकती है कि यह स्थल शिल्प कला के कलाकारों का गढ़ रहा हो जहां कलाकार मूर्तियों का निर्माण कार्य करते रहे हो एवं अलग-अलग मंदिरों की स्थापना हेतु यहां से मूर्तियां भेजी जाती रही हो। यथार्थ चाहे जो हो लेकिन फरवरी 2025-26 तक चलने वाले पुरातत्व विभाग को अभी और कार्य करने की जरूरत है। यहां की खोज परक जानकारी की पुस्तिका भी इस स्थल पर उपलब्ध होनी चाहिए ताकि पर्यटकों को पढ़कर यहां के बारे में समझने में आसानी हो।
अपनी डीपाडीह यात्रा में आप जब अंबिकापुर से राजपुर पहुंचकर शंकरगढ़ की पहाड़ियां चढ़ते हैं तब सर्पीले आकार के टेढ़े-मेढ़े रास्ते जहां प्राकृतिक सुंदरता के अनजाने दृश्य से आपको परिचित कराते है, वहीं वाहन चालन के नियंत्रण के लिए चेतावनी भी देते है। इस यात्रा में अंबिकापुर से राजपुर तक राष्ट्रीय राजमार्ग के विकास और चौड़ीकरण का एक अंधेरा पक्ष देखकर मन विचलित हो जाता है जहां हजारों पेड़ पेड़ों के ठूंठ अपनी कहानी कहते हैं। सैकड़ो वर्षों की उम्र के यह काटे गए पेड़ हमसे एक प्रश्न पूछते हैं कि क्या मानव विकास की यही परिभाषा है । क्या हमारा योगदान मानव के विकास में नहीं रहा है, और यदि रहा है तब हमारे अस्तित्व पर गंभीर चर्चा क्यों नहीं होती। ऐसे प्रश्नों के उत्तर और समाधान हमें गंभीरता से ढूंढने होंगे। क्योंकि हम उस स्लोगन के अनुयाई है जिसमें लिखा है ” वन है तो हम है”।
यदि आप इतिहास और संस्कृति के ज्ञान से परिचित होने की इच्छा रखते हैं औरटीले में बंद पत्थरों की कहानी उनकी जुबानी सुनना चाहते हैं तब डीपाडीह के शिल्प कला और मंदिरों को देखने समझने के लिए इसे अपने पर्यटन में शामिल करें। यहां वह सब बिखरा हुआ है जिसे आप अपने ज्ञान में समेटना चाहते हैं।
बस इतना ही फिर, मिलेंगे किसी अगले पड़ाव पर……
राजेश सिन्हा,8319654988















