इथेनॉल से पेट्रोल संकट का समाधान, लेकिन महंगी शक्कर ने बढ़ाई आम लोगों की चिंता
एमसीबी। केंद्र सरकार ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत तक इथेनॉल मिलाने की नीति को पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने, विदेशी मुद्रा बचाने और देश में ऊर्जा सुरक्षा मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम बताया था। इसके साथ ही आम लोगों को पेट्रोल की कीमतों में राहत मिलने की उम्मीद भी जगी थी। लेकिन अब गन्ने से इथेनॉल उत्पादन बढ़ने के बीच शक्कर की बढ़ती कीमतों ने एक नई चिंता खड़ी कर दी है।
बाजार में शक्कर की कीमतों में लगातार तेजी देखने को मिल रही है। करीब 40 रुपये किलो के आसपास मिलने वाली शक्कर अब 70 रुपये या उससे अधिक के स्तर तक पहुंचने की चर्चा है। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि पेट्रोल की कीमतों में आम लोगों को अपेक्षित राहत नहीं मिली, तो गन्ने के उपयोग को इथेनॉल की ओर बढ़ाने का सीधा लाभ उपभोक्ताओं को आखिर कितना मिला?
इथेनॉल नीति और महंगी शक्कर पर सवाल
इथेनॉल मिश्रण को बढ़ावा देने के पीछे सरकार का उद्देश्य पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करना और घरेलू संसाधनों का बेहतर उपयोग करना है। लेकिन शक्कर की कीमतों में बढ़ोतरी ने सरकार की तैयारी और बाजार प्रबंधन पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
आम लोगों का कहना है कि एक ओर पेट्रोल की कीमतों में कोई बड़ी राहत दिखाई नहीं दे रही है, वहीं दूसरी ओर रोजमर्रा की जरूरत की शक्कर लगातार महंगी होती जा रही है। ऐसे में महंगाई का अतिरिक्त बोझ सीधे परिवारों के घरेलू बजट पर पड़ रहा है।
त्योहारों से पहले बढ़ी चिंता
आने वाले दिनों में लगातार त्योहारों का दौर शुरू होने वाला है। त्योहारों में मिठाइयों और अन्य खाद्य पदार्थों में शक्कर की बड़ी खपत होती है। यदि कीमतों में इसी तरह तेजी जारी रही तो मिठाइयां भी आम लोगों की पहुंच से दूर हो सकती हैं।
वहीं बाजार से जुड़े कुछ लोगों का मानना है कि कीमतों में तेज वृद्धि के दौरान जमाखोरी और कालाबाजारी की आशंका भी बढ़ सकती है। हालांकि ऐसी स्थिति पर नियंत्रण के लिए प्रशासन को बाजार की निगरानी और जमाखोरी के खिलाफ कार्रवाई करनी होगी।
अब सरकार के सामने बड़ी चुनौती
इथेनॉल उत्पादन और पेट्रोल में मिश्रण की नीति को लेकर सरकार का अपना आर्थिक और ऊर्जा संबंधी लक्ष्य है, लेकिन इसके साथ खाद्य वस्तुओं की कीमतों पर नियंत्रण भी जरूरी है। आम लोगों के लिए सवाल सिर्फ पेट्रोल का नहीं, बल्कि रसोई के बजट का भी है।
अब देखना होगा कि सरकार शक्कर की बढ़ती कीमतों पर किस तरह नियंत्रण करती है और त्योहारों से पहले आम उपभोक्ताओं को महंगाई से राहत दिलाने के लिए क्या कदम उठाती है।
सवाल यही है- अगर इथेनॉल से पेट्रोल सस्ता नहीं हुआ और गन्ने से शक्कर महंगी होती गई, तो इस पूरी व्यवस्था का वास्तविक फायदा आम उपभोक्ता को कब मिलेगा?

