जंगलों की फूटती हंसी का पर्याय है-सोनहत पहाड़ से निकली हसदो नदी का उद्गम,और बूंद बूंद पानी
बीरेन्द्र श्रीवास्तव की कलम से
विशेष आलेख।कौन कहता है पहाड़ पत्थर दिल होते हैं, यदि ऐसा होता तब यह छोटी-छोटी नदियों की जलधारा का उद्गम इन पहाड़ियों से नहीं होता। ऐसा लगता है कि पत्थर दिल पहाड़ों पर जब पेड़ों ने हरितिमा फैलाई और पक्षियों ने चहचहाना शुरू किया। यहां वन्य जीव के बंदर, भालू, खरगोश, नीलगाय और शेर, बाग के नन्हे शावकों ने जब धमा चौकड़ी मचाई तब उन्हे देखकर बंदरों ने यहां वहां छलांग लगाना शुरू कर दिया। बंदरों के साथ खेलते खेलते एक दूसरे की पूछ खींचना जब शावको ने शुरू किया, तब सहसा पहाड़ हंस पड़े जंगल स्वाभिमान से भर गए और इसी खुशी के आंसू जब अंतर से बाहर निकाल कर धीरे-धीरे ढलान की ओर बहने लगे तब इसे नदियों का नाम दिया गया। यही आंसू नदी बनकर पृथ्वी पर जीवन की खुशियां बांटने लगे कहीं पर वह प्यासे को जल पिलाकर तृप्त होते या कहीं कुलाचें भरते हिरन छौनो की तरह नीचे कूद जाती है और बनाती है मनमोहक जलप्रपात बनाती है जिसका सौंदर्य जगह-जगह बाहें फैलाए आपको आमंत्रित करता है।
अपने जंगल, पहाड़ और हरियाली के लिए पूरे भारतवर्ष में छत्तीसगढ़ अपनी अलग पहचान है, अपने पूरे क्षेत्रफल का लगभग 45% भाग और हरीतिमा को समेटे छत्तीसगढ़ का उत्तरी भाग कई पहाड़ों और नदियों से भरा हुआ है। यहां विंध्याचल पर्वत की मैकल पर्वत श्रेणियां का विस्तार मनेन्द्रगढ़ -चिरमिरी -भरतपुर जिले की देवगढ़ पहाड़ी से प्रारंभ होकर आगे रामगढ़ और कुदरगढ़ पहाड़ तक फैला हुआ है। चांदभखार रियासत के भरतपुर से प्रारंभ इसी देवगढ़ पहाड़ी के कई हिस्से सिंदरी पहाड़,माचीगढ़ पहाड़, कैमूर पहाड़ी, सोनहत पहाड़, स्थानीय नाम के साथ अपनी पहचान बनाती है। यह पहाड़ साल वनों की विशाल शृंखला के साथ-साथ जैव विविधता से भरी हुई हैं।
बैकुंठपुर कोरिया से हम राजमार्ग क्रमांक 15 से लगातार चलते-चलते 30 किलोमीटर की दूरी तय करते हैं तब पहाड़ों की ऊंचाइयों का एहसास होने लगता है। जी हां यह सोनहत पहाड़ है विंध्याचल की कैमूर पहाड़ियों की बिखरी हुई श्रृंखलाएं यहां अलग-अलग नाम से जानी जाती है। इसी बीच साल वनों की विशाल श्रंखला के साथ सतपुड़ा के जंगलों की आहट हमें सुनाई देती है। सोनहत ग्राम से अभी चार साढे चार किलोमीटर आगे निकले ही होंगे कि हसदो नदी के उद्गम ने हमारा रास्ता रोक लिया। सड़क पर लगे बोर्ड से उद्गम तक जाने का रास्ता डेढ़ किलोमीटर दिखाई पड़ता है। गांव के बाहरी क्षेत्र से गुजरती यह सड़क हमें एक मंदिर के सामने ले जाकर खड़ा कर देती है। हसदो उद्गम के किनारे बने भगवान शिव का मंदिर नदियों को गंगा जमुना की पवित्रता और आस्था का स्थान प्रदान करती है। इन्हीं नदियों के लोटे भर जल से भगवान शिव प्रसन्न हो जाते हैं क्योंकि ईश्वरी शक्ति को मालूम है कि मानव को ईश्वर से जोड़े रखने के लिए इन नदियों को बचाए रखना कितना जरूरी है। यही जल स्रोत मानव का अस्तित्व बचाए रखेंगे। यह सच है की शिवलिंग को जल चढ़ाने के लिए ही सही हम इन नदियों को बचाए रखेंगे। प्रकृति में उपस्थित हर संरचना को मानवीय एवं वन्य जीवन की को बचाने की होड़ लगी हुई है। एक प्रतिस्पर्धा लगातार काम कर रही है, लेकिन कभी-कभी दुख होता है कि संरक्षण की इस प्रतिस्पर्धा के बीच इन्हें नष्ट करने की प्रतिस्पर्धा का डर इन्हें तिल तिल कर तोड़ रहा है।
विशाल बरगद की छाया में मंदिर प्रांगण से नीचे उतरते ही एक छोटी जलधारा हमें आकर्षित करती है जिसमें से निकलता पानी लगातार धीरे-धीरे बहता हुआ एक नन्हे बालक की तरह डगमगाते कदमों से आगे बढ़ रहा है। ग्रामीणों से पता चला कि यह हसदो का उद्गम है पहले यहां एक महुआ का पेड़ हुआ करता था जिसके नीचे निकलते इस पानी को गांव वालों ने लकड़ियों के पटरे से इसे चौकोर बांध दिया है। ग्रामीणों की भाषा में इसे ढोंढ़ी कहते हैं। इसी पानी से गांव के लोगों का निस्तार भी होता था। ढोढ़ी बन जाने से पानी यहां इकट्ठा रहता है और जमीन के भीतर भीतर पहाड़ से आने वाला पानी धीरे-धीरे जलधारा के रूप में आगे बढता है। इसी उद्गगम के आसपास जमीन से कई छोटी-छोटी धाराएं निकलकर ढलान की ओर बहती दिखाई पड़ती है। सामने नदी के रेत में एक गड्ढे में उठने छोटे-छोटे बुलबुलों के रूप में निकलती हवा और उसके बाद एक पानी का बुलबुले ऊपर आकर अपनी उपस्थिति दर्ज कराता है, और हसदो की जलधारा का उत्साह बढ़ाते हुए कहता है हसदो तुम आगे चलो हम तुम्हारे साथ हैं। यह सच है किसी भी नदी का उद्गम देखकर उसके प्रचंड वेग और पाट की चौड़ाई की कल्पना करना संभव नहीं होता । आश्चर्य होता है कि क्या इसी छोटी जलधारा पर हसदो पर बांडों बांध का निर्माण हुआ है, जो अपनी ऊंचाई के कारण छत्तीसगढ़ के सबसे बड़े बांध होने का गौरव प्राप्त करती है। भारत के कई राज्यों को अपनी इसी जल शक्ति के बल पर विद्युत ऊर्जा प्रदान करती है और सिर उठाकर स्वाभिमान के साथ छत्तीसगढ़ी होने का गौरव प्राप्त करती है। हसदो नदी के इस उद्गम स्थल को और आकर्षक बनाने का प्रयास इस अंचल के सांसद चरणदास महंत की प्राथमिकता में शामिल है। इसलिए छत्तीसगढ़ शासन द्वारा इसकी दूरी कम करने के लिए मुख्य मार्ग से मात्र आधा किलोमीटर के सीधे मार्ग से जोड़ने का प्रयास अब प्रगति पर है। पुल निर्माण के बाद संपर्क सड़क बन जाने के बाद यहां पहुंचना और आसान हो जाएगा हम मुख्य मार्ग से उतरकर पैदल भी यहां तक जा सकेंगे। इस मार्ग से गुरु घासीदास बाघ अभ्यारण जाने से पहले लोग हसदो उद्गम स्थल को देखने यहां जरूर पहुंचाना चाहते हैं। छोटे-छोटे बूंदों का धारा बनना और धारा से नदी का विशाल स्वरूप का यह स्थल आपको जीवन जीने के संघर्ष की कहानी से साक्षात्कार कराती है।
मेन्ड्रा गांव के धान के खेत के एक मेढ़ से निकलकर बहने वाली हसदो नदी के अपने उद्गम की कहानी मे कहती है कि आसपास के जंगल अब काफी कट चुके है पहाड़ों के पेड़ पौधों को काटकर खेत बना दिए गए हैं। जगह-जगह हसदो के उद्गम नाले को भी दबाने की कोशिश की जा रही है। इन्हीं खेतों की मेढ़ में बची यह नदी चुपचाप शांत आगे बढ़ती हुई अपनी लंबी यात्रा पर निकल पड़ती है। कई छोटे-छोटे नदी नालों को गले लगाते पत्थरों को काटकर अपना रास्ता बनाते हुए अपनी संघर्ष की कहानी दिखती हुई आगे बढ़ती है। इस यात्रा में इसके साथ तान, गेज, चौरई तथा हंसिया एवं झुमका जैसी नदियां जुड़ती चली जाती है। मनेन्द्रगढ़ के आसपास छोटी-छोटी नदियों में घुनैठी जैसी नदियां भी अपनी जलधारा से इसे लगातार समृद्धि करती रहती है, जिसमें कौवा नाला, गंगा धाम तुर्रा और ढुलकू से आने वाली कुदरी झरिया का पानी तीन झरिया के नाम से बिहार पुर में एक सड़क को काटती हुई पार करती है। इसी तिनझरिया के छोटे-छोटे जलप्रपात के ऊपर बहने वाली जलधाराएं अपने आकर्षक स्वरूप के कारण इस स्थल को पसंदीदा पर्यटन और पिकनिक स्पॉट बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करती है।
हसदो नदी अपने 176 किलोमीटर के लंबे बहाव के साथ आगे बढ़ती हुई कई छोटे-बड़े जलप्रपात का जगह-जगह निर्माण करती है जिसमें अमृत धारा, गौरघाट एवं उदल कछार का खर्रा नाला, जलप्रपात कोरिया एवं मनेन्द्रगढ़ जिले की सीमा मे पर्यटकों का प्रमुख आकर्षण है। गेज के साथ आगे बढ़ती हसदो का मैदान हसदो अरण्य के विशाल जंगलों का निर्माण करती है। यह मार्ग हाथियों के दल का बड़ा जाना पहचाना मार्ग है। बुजुर्गों का कहना है कि हाथी 25 – 30 साल तक अपने आवागमन के मार्ग को नहीं भूलते और यही शिक्षा वे अपने आने वाली छोटे-छोटे शावकों की अगली पीढ़ी को भी प्रदान करते हैं। हमेशा बुजुर्गों के साथ चलने वाला यह हाथियों का दल अपने बुजुर्गों का अनुगमन करता है। यही कारण है कि हाथी कभी अपना रास्ता नहीं भूलते और जिस रास्ते से आते हैं उसी रास्ते वापस अपनी मूल निवास की ओर चले जाते हैं। केवल आर्थिक विकास को सर्वोपरि मानते हुए हमने इन हाथियों के शांत विचरण और आवागमन के मार्ग अरण्य वन को भी नष्ट करना प्रारंभ कर दिया है। क्या पच्चीस तीस वर्षों से जाने पहचाने इन जंगलों में विचरण तथा भोजन पर उनका अधिकार नहीं है। इस तरह के कई प्रश्न हैं जो हमारी जैव विविधता को टुकड़ों टुकड़ों में तोड़ रहे हैं। मानसिक शांति के लिए आवश्यक प्राकृतिक जैव विविधता , झरनों का मधुर संगीत और उछलते कूदते नन्हे वन्य जीव को समाप्त करने के बाद हम अपनी अगली पीढ़ी को क्या देकर जाएंगे। विकास की यह दौड़ क्या प्राकृतिक संसाधनों को समाप्त करके ही पूरी होगी या प्रकृति और जैव विविधता को बचाए रखकर भी हम अपने विकास का कोई नया रास्ता ढूंढ सकते हैं। यह प्रश्न आज इस देश के प्रत्येक व्यक्ति की जुबान पर है।
पहाड़ों के हृदय से निकलकर मीठे धान के खेतों से स्वच्छ और शुद्ध जल लेकर चलती इस नदी को शहरी जनजीवन की गंदगी एवं कोयला उद्योग से निकलते कचरे ने इस नदी को प्रदीप प्रदूषित कर दिया है। इसी प्रदूषण के कारण एक स्वच्छ मीठे जल की नदी को छत्तीसगढ़ की सर्वाधिक प्रदूषित नदी का दर्जा दिया गया है, यह चिंता का विषय है। गंदे नालों को भी अपने जल में समाहित कर शुद्ध कर लेने की क्षमता रखने वाली यह नदी आज प्रदूषित नदी क्यों कहलाती है। इस पर हमें विचार करना होगा। जरूरत यह है कि नदियों के रेत को बचाए रखा जाए। रेत नदी का सौंदर्य होती हैं एवं पानी को स्वच्छ रखने का एक सशक्त माध्यम है। हम जानते हैं कि जब तक प्रकृति है तभी तक मानव का अस्तित्व है। इसमें पेड़ पौधे, जंगल पहाड़ के साथ इनके बीच बहने वाली हसदो जैसी नदियां भी शामिल है। मनेन्द्रगढ़ और इसके आसपास के गांव को पीने का पानी प्रदान करने वाली इस नदी को मनेंद्रगढ़ की जीवनदायिनी नदी कहा गया है। यही कारण है कि मनेन्द्रगढ़ में इसे “हसदो गंगा” का नाम दिया गया है, लेकिन हस्दो किनारे विकसित जंगलों का उद्योगों के लिए लगातार कटाव तथा कांक्रीट के शहरों के निर्माण के लिए रेत का अंधाधुंध उत्खनन आज इन्हें समाप्ति की कगार पर खड़ा कर चुका है। पृथ्वी और मानव को बचाए रखने के लिए नदियों को बचाना हमारा कर्तव्य है। विकास का कोई भी पैमाना मानव जाति के अस्तित्व को बचाने से बढ़कर नहीं हो सकता। यदि मानव ही नहीं रहेगा तो फिर विकास किसके लिए, जैसे प्रश्न आज भी ज्वलंत है और हमेशा ज्वलंत रहेंगे।
बस इतना ही फिर मिलेंगे किसी अगले पड़ाव पर
राजेश सिन्हा 8319654988






