SIR और नागरिकता का नया इम्तिहान लोकतंत्र और दस्तावेज़ों के बीच फँसा मतदाता
(व्यंग)
छत्तीसगढ़ में इन दिनों SIR चल रहा है। नाम सुनते ही लगता है जैसे कोई बहुत बड़ा, बहुत गंभीर और बहुत वैज्ञानिक अभियान हो। लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि यह अभियान कम और आम नागरिकों के लिए एक नया नागरिकता परीक्षा ज़्यादा बन गया है।
कायदा बिल्कुल साफ़ है—अगर आपका नाम 2003 की मतदाता सूची में है तो आप सुरक्षित हैं। अगर नहीं है, तो आप शक के दायरे में हैं। और अगर आप 2003 में मतदाता बनने लायक उम्र में ही नहीं थे, या उस समय आपके माता‑पिता, अभिभावक या परिवार के बड़े इस दुनिया में नहीं हैं—तो फिर आपकी देशभक्ति, आपकी नागरिकता और आपका अस्तित्व सब संदेहास्पद हो जाता है।
अब ज़रा सोचिए, 2003 में जो बच्चा पाँच साल का था, आज वही व्यक्ति टैक्स देता है, वोट डाल चुका है, राशन कार्ड रखता है, आधार कार्ड है, पैन कार्ड है—लेकिन अगर 2003 की वोटर लिस्ट में नाम नहीं मिला, तो प्रशासन की नज़र में वह मानो नए पैदा हुए नागरिक हैं।
सबसे रोचक स्थिति उन बुज़ुर्गों की है, जो उस समय मध्य प्रदेश का हिस्सा रहे छत्तीसगढ़ में रहते थे। तब वे वैध निवासी थे, आज भी वैध निवासी हैं, लेकिन दस्तावेज़ों की इस नई परीक्षा में वे खुद को साबित नहीं कर पा रहे। वे पूछते हैं—
“बेटा, जब छत्तीसगढ़ बना ही नहीं था, तब हम किस राज्य की वोटर लिस्ट दिखाएँ?”
इस सवाल का जवाब शायद फाइलों में कहीं खो गया है।
अधिकारियों की पूछताछ का अंदाज़ ऐसा है, मानो कोई आतंकवादी संगठन की भर्ती सूची बन रही हो। वही व्यक्ति, जिसने कई बार मतदान किया, जिसे चुनावी पर्चियाँ मिलीं, जो हर बार लोकतंत्र के उत्सव में शामिल हुआ—आज उससे पूछा जा रहा है कि आप यहाँ के हैं या नहीं?
लगता है लोकतंत्र में अब वोट डालना ही काफी नहीं है, बल्कि हर कुछ साल में यह भी साबित करना पड़ेगा कि आप सच में इसी ज़मीन पर पैदा हुए थे, यहीं बड़े हुए और यहीं मरने का इरादा रखते हैं।
सरकार शायद यह भूल गई है कि छत्तीसगढ़ कोई हाल ही में बसा टापू नहीं है, जहाँ लोग बाहर से अचानक आ गए हों। यहाँ पीढ़ियाँ रही हैं, जिनके पास यादें हैं, कहानियाँ हैं—लेकिन फोटोकॉपी कराने लायक कागज़ नहीं हैं।
विडंबना यह है कि जिनके पास ताकत है, रसूख है, उनके दस्तावेज़ खुद‑ब‑खुद पूरे हो जाते हैं। और जिनके पास सिर्फ़ मेहनत, पसीना और पुरानी यादें हैं, उनसे कहा जाता है
“सबूत लाओ।”
आज सवाल सिर्फ़ वोटर लिस्ट का नहीं है। सवाल यह है कि क्या नागरिक होने की पहचान अब फाइलों और फार्मों तक सीमित हो जाएगी? क्या लोकतंत्र में इंसान से ज़्यादा कागज़ की कीमत होगी?
अगर ऐसा ही चलता रहा, तो आने वाले समय में शायद पूछा जाए—
“आप छत्तीसगढ़ के नागरिक हैं? अच्छा, तो यह बताइए कि 2003 में आप कहाँ थे, क्या कर रहे थे, और क्यों ज़िंदा थे?”
यह व्यंग नहीं, लोकतंत्र की चिंता है। क्योंकि जब नागरिक खुद को साबित करने में लग जाए, तो शासन को जवाब देने वाला कोई नहीं बचता।
राजेश सिन्हा 8319654988
