विकास के लिए पृथ्वी पर विनाश का कितना बोझ, पर्यावरण एवं वन संरक्षण में बदलते अर्थ
पर्यावरण एवं समाज चिंतन अंक क्रमांक – 21 वीरेंद्र श्रीवास्तव की कलम से
संसाधनों की होड़ में, पृथ्वी है पूछती
मानव बता दे कितनी, मेरी उम्र है बची
विशेष आलेख।दुनिया आज विकास की नई ऊंचाइयों के नए कीर्तिमान बना रही है। विश्व के अमीर विकसित देशों का दावा है कि हम मानव जीवन को सारी सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए संकल्पित है। नई-नई तकनीक जीवन को सुखी बनाने के लिए उपयोग किए जा रहे हैं। जीवन के उपयोगी इस तकनीक के साथ-साथ युद्ध के नए शस्त्रों का आविष्कार अपने देश के शौर्य और शक्ति का पर्याय बन रहा है। इसे कोई संतुलन के लिए बनाने की बात करता है, तो कोई देश स्वयं को नंबर वन साबित करने के लिए अत्याधुनिक मिसाइल और परमाणु बम के निर्माण में जुटा हुआ है। जबकि सभी यह जानते हैं कि आज पूरी पृथ्वी बारूद के कैसे ढेर पर बैठी हुई है, जहां एक व्यक्ति विशेष का अहित नहीं होगा बल्कि पूरी मानवता और पृथ्वी नष्ट होने के दाव पर लगी हुई है। अब तो पृथ्वी भी मानव से पूछने को बाध्य हो रही है कि ऐ मानव बता दो मेरी उम्र अब कितनी बची है।
शांति, सद्भावना और पृथ्वी को बचाने के छोटे-छोटे प्रयास भी अब निराश कर रहे हैं। पर्यावरण संरक्षण, वन एवं पृथ्वी को बचाने के लिए किए जा रहे प्रयासों के लिए आयोजित सम्मेलनों में किए गए वादे राजनीतिक वादों की तरह केवल दुनिया को बताने एवं अपना वर्चस्व साबित करने के स्थल बन रहे हैं। पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन के लिए गठित वैश्विक संस्था संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन जो संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन के ढांचे के अंतर्गत आयोजित वार्षिक सम्मेलन होता है। जिसे कॉप सम्मेलन भी कहते हैं। इसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन से निपटने में हुई प्रगति का आकलन करना है। 2015 में हुए पेरिस कॉप सम्मेलन में ग्रीन हाउस गैस गैस उत्सर्जन को कम करने तथा ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ते तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ने से रोकने के प्रयासों पर विचार करना था लेकिन इसके समाधान की दिशा मे क्रियान्वन अपनाने में गंभीरता नहीं दिखाई देना चिंतित कर रहा है। 2005 से जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए क्योटो प्रोटोकॉल पर बातचीत करने का सिलसिला जारी है विगत 2024 में सम्पन्न काप सम्मेलन में सदस्य देश नहीं होने पर भी उनके प्रतिनिधियों को इस ग्रहण विचार श्रृंखला में शामिल किया गया। इस सम्मेलन में पिछले बैठकों में जलवायु परिवर्तन के संरक्षण के लिए निर्धारित मुद्दों और दायित्व को स्थापित करने के प्रयासों को आगे बढ़ाने हेतु निर्णय लिए जाते हैं। 2024 के जी-20 की बैठक में जलवायु परिवर्तन में ग्लोबल वार्मिंग से निपटने के लिए पर्याप्त धन देने का सहयोगी दलों ने संकल्प लिया और अरबो से आगे खरबो डॉलर का धन देने पर सहमति प्रदान की। जीवाश्म आधारित फ्यूल ऊर्जा का सर्वाधिक उपयोग कर विश्व का 17% मीथेन उत्सर्जन वाला राष्ट्र अमेरिका है। इसी राष्ट्र के ट्रंप प्रशासन के दौरान पेरिस समझौते से पीछे हटने और अब अंतरराष्ट्रीय जलवायु वित्त प्रबंधन को अत्यंत अपर्याप्त मानकर सहयोग से पीछे हटने की अमेरिका की भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं।
पूरे विश्व को पीने का पानी उपलब्ध कराने वाले हिमालय आर्कटिक और अंटार्कटिक ग्लेशियर पृथ्वी के वह संजय भंडार है जो वर्षों तक आने वाली पीढ़ी को भी पीने का मीठा पानी देते रहेंगे किंतु आज के जलवायु परिवर्तन के कारण यह बड़े जल स्रोत भंडार अब संकट में दिखाई पड़ रहे हैं। एक वैज्ञानिक सर्वेक्षण के अनुसार 2011 से 2024 के बीच ग्लेशियर के भंडार 40% तक घट गए हैं या पिघलकर झील में बदल गए हैं। भारत के लद्दाख, हिमाचल, उत्तराखंड एवं सिक्किम जैसे राज्यो पर इसका स्पष्ट प्रभाव दिखाई पड़ता है जिसमें प्रतिवर्ष आने वाले बाढ़ और बादल फटने की घटनाओं के कारण होने वाली जनधन की हानि इसका उदाहरण है।
विश्व स्तर पर आर्थिक क्षेत्र में इन ग्लेशियरों पर पृथ्वी की जलवायु परिवर्तन से होने वाली क्षति को नजरअंदाज कर उसकी भूमि पर कब्जा करने की नियत चिंताजनक है क्योंकि बड़े देशों की नजर आर्थिक क्षेत्र के ग्लेशियर की भूमि के नीचे स्थित रेयर अर्थ मेटल के साथ तेल एवं गैस के भंडार हैं। अमेरिकी भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने 2019 में ही बता दिया था कि क्षेत्र में दुनिया का 13% तेल एवं 30% से ज्यादा गैस भंडार के साथ दुर्लभ खनिज का समृद्ध भंडार मौजूद है। जलवायु परिवर्तन के हो रहे बदलाव में यह भी बताया गया है कि 2030 तक इस क्षेत्र में बर्फ विहीन मौसम हो जाने की संभावना है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ग्रीनलैंड पर कब्जे की चर्चा का यह बहुत बड़ा कारण है। वैसे भी इन्हीं संभावनाओं को देखते हुए अमेरिका ने यहां एक अहम सैन्य ठिकाना थुले में (जिसे अब पिटुफिक स्पेस बेस कहा जाता है) बनाया गया है यहां स्थित विशाल राडार की पकड़ में अंतरिक्ष में टेनिस बॉल जैसी छोटी चीज को भी खोजा जा सकता है। यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि रूस एवं अमेरिका के बीच गुजरने वाली कोई भी बैलिस्टिक मिसाइल यही से होकर गुजरेगी जिसे देखा जा सकेगा एवं रोका जा सकता है। ग्रीनलैंड आर्कटिक क्षेत्र में बसे 8 देशो में से एक देश है। आर्कटिक समुद्री तट की आधे से ज्यादा लंबाई अकेले रूस के हिस्से में आती है जहां नागुरस्के जैसा एयरबेस पहले से मौजूद है। यह पहले बर्फ से ढक जाता था लेकिन अब परमाणु पनडुब्बी बेड़े का बड़ा हिस्सा यहां तैनात है। यहां कोला प्राय:दीप में तैनात पनडुब्बी सभी बड़े विमानों की आवाजाही पर नजर रखती है।
संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन 2025 में शामिल देश जीवाश्म ईंधन के प्रयोग एवं वनों की कटाई को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने के संदर्भ में कमी पाए जाने से खुश नहीं थे लेकिन शामिल देशों द्वारा लैगिक कार्य योजना एवं न्याय संगत संक्रमण तत्व विकसित करने के निर्णय पर सभी एकमत हुए। बढ़ते वैश्विक तापमान ग्लोबल वार्मिंग पर चिंता व्यक्त करते हुए वर्ष 2024 को सबसे ज्यादा गर्म वर्ष घोषित किया गया। यह आंकड़ा औद्योगिक क्रांति से पहले नियत तापमान से 1.5 डिग्री सेल्सियस से अधिक था और पेरिस समझौते पर निर्धारित योगदान के लिए बनाए गए वैश्विक निर्णय पर खरा नहीं उतर सका। कई देशों द्वारा इस बढ़ते तापमान पर अंकुश लगाने के संबंध में प्रारंभ किए जाने वाले प्रयास की अपनी योजनाएं भी प्रस्तुत नहीं करना सर्वाधिक चिंता का विषय रहा।
भारत सहित कई देशों के प्रयास इस दिशा में सराहनीय रहे हैं बढ़ती ऊर्जा की खपत को पूरा करने हेतु सोलर ऊर्जा एवं पवन ऊर्जा का उपयोग और इसे बढ़ावा देने के उपाय प्रशंसा योग्य है। 2030 तक भारत में 500 गीगावॉट सौर एवं पवन ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इसमें 2025 तक 200 गीगावॉट ऊर्जा का उत्पादन लक्ष्य तक हम पहुंच चुके हैं। 2030 तक गैर जीवाश्म ईंधन के लक्ष्य हासिल करने के वैश्विक निर्णय के संसाधनों का 50% क्षमता भारत में निर्धारित समय से पहले ही पूरा कर लिया है। यह एक स्वागत योग्य कदम है। इसी तरह 2070 में नेट जीरो अर्थात 100% ऊर्जा का उत्पादन गैर जीवाश्म संसाधन से प्राप्त करने के लक्ष्य को पूरा करना हमारा उद्देश्य है। लेकिन इन संसाधनों के बाद भी पेट्रोल डीजल की खपत एवं कोयले का उत्खनन पर बढ़ता दबाव जहां वैश्विक तापमान बढ़ा रहा है वही कोयले के उत्खनन के लिए वनों की कटाई निर्बाध रूप से जारी है। चिंता यह है कि बेचारे जंगल केवल इसलिए काट दिए जाते हैं क्योंकि उन्होंने अपने सीने में कोयले का भंडार एकत्र कर रखा है। विशेष कर साल वनों के नीचे कोयले का पाया जाना सैकड़ो वर्षों के बुजुर्ग साल वनो और उसमें विकसित जैव विविधता की समाप्ति का कारण बन रहे हैं। जबकि देश के नीति निर्धारक प्रतिनिधियों को यह मालूम है कि वनों को काटना पृथ्वी एवं मानव अस्तित्व को टुकड़े-टुकड़े में समाप्त करना है। लेकिन पृथ्वी को बचाने की चिंता की कमी यहां स्पष्ट दिखाई देती है।
पृथ्वी की कोख में भूमि के भीतर स्थित कोयले को निकालने एवं वनों को बचाने का प्रयास आज की चिंता में शामिल नहीं दिखाई देता, अन्यथा संरक्षण सहित कोयले का उत्पादन एवं और उपयोग के कई उपाय है जिसे अपना कर काफी सीमा तक हम वनों को बचा सकते हैं। ओपन कास्ट पद्धति की बजाय भूमिगत खान अंडरग्राउंड माइनिंग उत्खनन की पद्धति अपनाकर जंगलों को बचाने और कोयला निकालने की अच्छी तकनीक साबित हो सकती है। आज भूमिगत माइनिंग उत्खनन में कई आधुनिक मशीन वर्तमान में उपलब्ध है जो उत्पादन के नए कीर्तिमान स्थापित कर रही है। इस तकनीक के माध्यम से संरक्षण सहित कोयले का अच्छा उत्पादन किया जा सकता है । वर्तमान में संरक्षण सहित कोयले का उत्पादन का मूल मंत्र आज की जरूरत है जिसे सरकार, सहित औद्योगिक तकनीक एवं उसके संचालकों के दृढ़ निश्चय से ही प्राप्त किया जा सकता है। इसकी अनदेखी किसी व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाने जैसे आरोपों को समर्थन देती है जो देश के राष्ट्रभक्त नागरिकों को दुख पहुंचाती है। दुनिया भर में जंगलों की कटाव की स्थिति बेहद चिंताजनक है जिसका प्रभाव अलग-अलग क्षेत्र में दिखाई पड़ता है।
निरंतर जलवायु परिवर्तन के बदलाव ने आज स्थिति इतनी बदल दी है कि आषाढ़ मास में बरसते पानी में भीगते बच्चों की खुशियों पर भी अब ग्रहण लग गया है । भीगते बच्चों को अब रोकना होगा, अन्यथा उनके शरीर पर तेजाबी पानी का प्रभाव त्वचा पर फफोले के रूप में दिखाई देगा। भारत जैसे देश भी अब तेजाबी वर्षा से प्रभावित हो रहे हैं। भारत के मौसम विज्ञान (IMT) के द्वारा अपने 34 वर्षों के अध्ययन में यह पाया गया है कि देश के कई हिस्सों में वर्षा जल अब अम्लीय हो रहा है जो सामान्य वर्षा जल के 5.6 पी एच स्तर से नीचे जा रहा है। लगातार बढ़ती गाड़ियों की संख्या और उद्योगों से निकलने वाली हवा में व्याप्त कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को सोखकर वर्षा का जल सामान्यत: मानव उपयोग की सीमा 5.6 पीएच स्तर तक रहता है। जिसे हम स्वीकार कर चुके हैं, लेकिन अब यह घटकर चार से पांच पीएच स्तर तक पहुंच रहा है, जिससे बारिश के पानी में अम्ल की सांद्रता बढ़ रही है। यह स्थिति अत्यधिक चिंताजनक है। इसके समाधान की दिशा में हमें प्रयास करने होंगे। सड़कों पर दौड़ती गाड़ियां, उद्योगों का निकलता धुआ, तेल उत्पादक रिफाइनरी, उर्वरक संयंत्र और शिपिंग यार्ड जैसे उद्योगों से निकलने वाले प्रदूषक तत्व इसके लिए उत्तरदायी होते हैं। इसकी चपेट में हमारे देश के विशाखापट्टनम, प्रयागराज एवं असम का गोदनबाड़ी जैसे बड़े नगर सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।
बदलते जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को कम करने में विश्व के सभी देशों को साथ आना होगा। जंगलों के कटाव को रोकने की दिशा में किए गए प्रयासों को निकालना और गंभीरता से नहीं लेने के कारण पढ़ने वाले प्रभाव इन आंकड़ों में दिखाई पड़ते हैं । वर्ष 2021 के वैश्विक सम्मेलन में सदस्य देशों एवं उद्योग संचालक प्रतिनिधियों ने 2030 तक कटाई को पूरी तरह रोकने का संकल्प पारित किया था, लेकिन 2023 में 811 लाख हेक्टेयर (करीब 02 करोड़ एकड़) जंगल खत्म कर दिए गए। यह क्षेत्र इंग्लैंड जैसे देश का आधा हिस्सा है। फॉरेस्ट डिक्लेरेशन एसेसमेंट रिपोर्ट के अनुसार दुनिया अपने लक्ष्य से 63% पीछे चल रही है जो संकल्प एवं हकीकत के अंतर को दिखा रही है और हमारे कथनी और करनी के अंतर का स्पष्ट उदाहरण है। एक रिपोर्ट के अनुसार 2015 के पेरिस समझौते के बाद बैंकों ने उन कंपनियों को लगभग 26 अरब डॉलर का पैकेज दिया है जो जंगल काटने में लगी हुई है। कृषि कार्य के लिए 85% जंगल काटे गए हैं इसके लिए हर साल 409 अरब सरकारी मदद दी जाती है जबकि वनों की रक्षा एवं पुनर्स्थापना हेतु केवल 5.9 अरब डॉलर अंतरराष्ट्रीय फंडिंग दी जाती है। इस दिशा में भारत जैसे देश में वन अधिकार पट्टे दिए जाने जैसे निर्णय पर आज पुनर्विचार की आवश्यकता है।
वनों को बचाने वैश्विक तापमान बढ़ने को रोकने एवं तेजाबी बारिश के साथ-साथ पृथ्वी की लंबी उम्र तक बचाए रखने और भावी पीढ़ी को इसी स्वरूप में सौंपने के इस चिंतन में हमें अपने छोटे-छोटे प्रयासों को भी आगे बढ़ना होगा एक अध्ययन में ज्ञात हुआ है कि बांस का एक पेड़ अपने तने से एक व्यक्ति के लिएदिन भर में उपयोग किए जाने वाले पर्याप्त ऑक्सीजन उत्पन्न करता है। ऐसे समय में जब हमारे शहर कांक्रीट के जंगल बनते जा रहे हैं शहरों में ऐसे स्थल बचाएं रखे जाएं, जहां आबादी के हिसाब से बांस के जंगल लगाए जा सके और वहां बांस का रोपण किया जाए। इसी तरह सर्वाधिक परिवहन साधनों को बढ़ावा दिया जाए ताकि जीवाश्म आधारित ऊर्जा पेट्रोल ,डीजल की खपत पर अंकुश लगाया जा सके। कोयले पर आधारित उद्योगों को प्राकृतिक संसाधनों से प्राप्त बिजली पर संचालित करने के लिए प्रोत्साहित किया जाए। व्यक्तिगत गाड़ी का उपयोग कम किया जाए। गाड़ियों को प्रतिष्ठा का प्रतीक (स्टेटस सिंबल) ना बनाया जाए। इस मानसिकता से देश के लोगों को उबरना होगा। तब हम अपनी पृथ्वी क को इसकी पूरी उम्र दे पाएंगे। पृथ्वी के संरक्षण एवं इसमें उपस्थित जैव विविधता के संरक्षण में देश व्यक्ति और समाज के सहयोग से ही यह सब संभव हो पाएगा। वैचारिक एवं क्रियान्वयन के स्तर पर हम सभी को आगे बढ़ना होगा।
बस इतना ही फिर मिलेंगे अगले पड़ाव पर




