“सारासोर” श्रीराम जानकी मंदिर और पाताल लोक का रास्ता
पर्यावरण एवं पर्यटन क्रमांक 45 बीरेन्द्र श्रीवास्तव की कलम से
विशेष आलेख। छत्तीसगढ़ का वैभव भारतवर्ष का हृदय स्थल होने के साथ-साथ यहां की प्राकृतिक वन संपदा, पहाड़, नदियां और झरने हैं। यही कारण है कि राम वन गमन मार्ग के शोधकर्ता मन्नू लाल यदु की पुस्तक में लिखा है कि उत्तरी छत्तीसगढ़ के सौंदर्य से प्रभावित होकर इस क्षेत्र को दंडकारण्य की देवभूमि का दर्जा दिया गया था। यहां का आदिवासी जनजीवन अपनी सांस्कृतिक विरासत में त्रेता युग के भगवान राम सीता एवं लक्ष्मण की वन गमन यात्रा की गाथाओं से भरी हुई है, जिसकी अभिव्यक्ति यहां के आचार विचार, नामकरण, रहन-सहन तथा गांव देहात के साथ प्रकृति प्रदत्त पहाड़ों और नदियों के नाम में भी अंकित है। भगवान राम से जुड़ी उनकी यादें आदिवासी महिलाओं एवं पुरुषों के शरीर में अंकित गोदना में नाम एवं चित्र के रूप में दिखाई पड़ती है। नई पीढ़ी की महिलाओं, पुरुषों को भी ग्रामीण हाट बाजार में ऐसे गोदना गोदवाते देखा जा सकता है। इसी तरह पहाड़ों, नदियों के किनारे कई स्थान ऐसे बन गए हैं जो आज भी उनकी संस्कृति और स्मृतियों को समेटे हुए हैं। यहां पहुंचकर हम अपने आराध्य भगवान श्रीराम से जुड़ी किंवदंतियों और गाथाओं को याद करते हैं।
भगवान श्रीराम अपने वनवास काल में अयोध्या से निकलकर चित्रकूट पहुंचे थे, जहां कुछ समय व्यतीत करने के बाद उन्होंने आगे की यात्रा मध्य प्रदेश के सतना सीधी मार्ग से होते हुए छत्तीसगढ़ के जनकपुर में मवई नदी के किनारे स्थित सीतामढ़ी हरचौका से वर्तमान छत्तीसगढ़ में प्रवेश किया था। जंगलों पहाड़ों के बीच उस समय ऋषि मुनि एवं वनवासी नदी मार्ग से यात्राएं तय किया करते थे क्योंकि नदियां अपने उद्गम से निकलकर अंतिम पड़ाव में पहुंचकर निश्चित स्थान पर किसी दूसरी नदी में मिल जाती है। आसपास के प्राकृतिक स्थलों की जानकारी स्थानीय निवासियों को होने के कारण यह यात्रा के लिए आसान होता था। संत महात्मा एवं ऋषि मुनियों के आश्रम भी हमेशा से नदियों पहाड़ों से निकलने वाले जल स्रोत के किनारेशांत स्थल पर हुआ करते थे। वनवासी भगवान श्रीराम ने अपनी यात्रा में इन सभी ऋषियों के आश्रम को अपना विश्राम स्थल बनाया क्योंकि लंबी तपस्या के बीच सभी ऋषि मुनि भगवान को अपने आश्रम में आमंत्रित करते थे। इन्हीं आश्रमों में रहकर राक्षसों की उपस्थिति एवं उन्हें समाप्त करने की नई योजनाओं को क्रियान्वित करना आसान होता था। दूर-दूर तक फैली पहाड़ की श्रृंखलाएं स्थानीय लोगों के द्वारा अलग-अलग नाम से जानी जाती है। मनेन्द्रगढ़ एवं कोरिया जिले के बीच फैली देवगढ़ की पहाड़ियां सूरजपुर जिले के ओड़गी विकासखंड तक फैली हुई है। इन्हीं पहाड़ियों के श्रृंखलाएं रेड़ नदी एवं महान नदी के बीचो-बीच चलती है कहीं-कहीं पर रेड नदी की झुकी हुई पहाड़ियां रेड नदी को अपने ऊपर से पार करने की अनुमति भी देती है। इन्हीं पहाड़ों की तराई में बहने वाली महान नदी के किनारे स्थित “सारासोर राम जानकी मंदिर” धार्मिक मान्यताओं एवं अपने प्राकृतिक सौंदर्य के कारण लोकप्रिय पर्यटन स्थल बनता जा रहा है।
छत्तीसगढ़ राज्य के राज्य मार्ग क्रमांक 12 के (पटना -भैयाथान-प्रतापपुर) मार्ग से 40 किलोमीटर दूरी तय करने के बाद भैयाथान पहुंचने और उससे आगे 17 किलोमीटर पलमा गांव चंद्रामेढ़ा में एक बोर्ड में बांई ओर उत्तर पश्चिम दिशा में संकेत दर्शाता हुई दिखाई पड़ता है जिसमें लिखा है “श्री राम वन गमन मार्ग, राम जानकी मंदिर 05 किलोमीटर, ” इसी बोर्ड में नीचे सीता लेखनी एवं लक्ष्मण पंजा 69 किलोमीटर भी दर्शाया गया है जो रामवन गमन मार्ग का एक हिस्सा है। महान नदी के किनारे बने इस राम जानकी मंदिर की पौराणिक मान्यता है कि वनवास काल में भगवान राम इस स्थल पर संत महात्माओं के साथ कुछ समय बिताये थे। पहाड़ों के साथ-साथ चलती सड़क से 05 किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद हमें महान नदी का कल- कल स्वर दूर से ही सुनाई पड़ने लगता है जिसमें व्याप्त मधुर शांति और आध्यात्मिक वातावरण की गूंज इस स्थल को विशेष दर्जा प्रदान करती है।
जी हां, इसी गांव का नाम है सारासोर। पहाड़- मोरनी ग्राम पंचायत का यह गांव पहाड़ की तराई में बसा हुआ है। ग्राम वासियों से प्राप्त जानकारी के अनुसार सारासोर का यह राम- जानकी मंदिर मडगरा पहाड़ की तराई में बना है। इसी पहाड़ के सामने मुग्ध कर देने वाली महान नदी की प्राकृतिक छटा छोटे-छोटे पत्थरों से टकराकर उछलती कूदती आगे बढ़ती जाती है। अंगरक्षक की तरह किनारे खड़े पेड़ पौधों के बीच से आने वाली सूर्य की किरणों की पकड़ से दूर जाने की लगातार कोशिश नदी को लंबी यात्रा करने का साहस प्रदान करती है। महान नदी का यह चंचल विचरण आपको मंत्र मुग्ध कर स्थिर कर देता है। लगता है इसी प्रकार घंटो यहां बैठकर इस नदी को देखते रहे और इसकी प्राकृतिक सुंदरता को आत्मसात कर भीतर तक भर ले। मडगरा पहाड़ की इन्हीं ऊंचाइयों में लगभग 150 मी. की ऊंचाई पर राम जानकी का मंदिर स्थित है। अपनी आभा से युक्त इस मंदिर के अंदर प्रवेश करते ही आप आध्यात्मिक आभा से रोमांचित हो जाते हैं। भगवान राम सीता एवं लक्ष्मण की स्थापित मूर्तियों से सुसज्जित यह मंदिर आपको जहां आध्यात्मिक चेतना से जोड़ती है वहीं इसके परिसर में बने पौराणिक कथाओं के कई चित्र मूर्तियों के माध्यम से इस मंदिर में बनाए गए हैं जो आपकी चेतना को पौराणिक कथाओं से जोड़ती है। भगवान विष्णु के कई अवतार और उनके द्वारा पृथ्वी पर अत्याचार से मुक्त करने के लिए किए गए उपायो को मूर्तियों में ढाल कर अलग-अलग घटनाओं की प्रस्तुति इस मंदिर को आकर्षक बनाती है। इस मंदिर में नरसिंह अवतार, कृष्ण अवतार एवं त्रेता युग के राम अवतार की झलकियां अलग-अलग रूपों में अपने भक्तों की रक्षा करते हुए मूर्ति स्वरूप में चित्रित किया गया है। इसी पहाड़ी के नीचे बहती महान नदी के मध्य ऊंची पहाड़ियों पर बना भगवान भोले शंकर का शिव मंदिर दूर से ही बरबस आकर्षित करता है। इसी आकर्षण के बल पर आप उनके मंदिर तक पहुंच जाते हैं। यहां शिवलिंग को जल चढ़ाकर आपकी आध्यात्मिक यात्रा की यह थकान समाप्त हो जाती है। क्रमबद्ध श्रद्धालुओं का आगमन और हर हर महादेव का उद्घोष आध्यात्मिक शांति के साथ-साथ आंखें मूंदकर अपनी आत्मा तक भगवान शिव को आत्मसात करने की प्रेरणा देता है।
शिव मंदिर की सीढ़ियां चढ़ने से पहले सतलोकी माता का मंदिर का दर्शन और आशीर्वाद आपके लिए उस अदृश्य शक्ति का आशीर्वाद होता है जहां सात देवियां एक साथ विराजमान है। सतलोकी माता का इतिहास यहां के बैगा आदिवासियों के बीच रहस्य एवं रोमांच की देवी के रूप में प्राकट्य माना जाता है। किवदंतियों में कहा जाता है कि सतलोकी माता पहले पाताल लोक में विराजमान थी। महान नदी की बहती जलधारा के किनारे पहाड़ों की गोद में यहां एक स्थान पर पानी की गहराई इतनी ज्यादा है कि सामान्य व्यक्ति का वहां पहुंचना संभव नहीं है। यही कारण है कि इसे पाताल लोक का द्वार भी कहा जाता है। कहते हैं कि आदिवासी बैगा पुजारी इसी पाताल मार्ग से नीचे जाकर सतलोकी माता की पूजा किया करते थे। माता द्वारा प्रदत्त एक सिद्ध तलवार बैगा पुजारी हमेशा अपने साथ रखता था और पूजा पाठ के बाद इसी तलवार के साथ वह बाहर आया करता था। बैगा पुजारी को एक बार पूजा करने के लिए पाताल लोक में जाने की अनुमति दी गई थी, लेकिन एक दिन पूजा के समय वह पाताल लोक में पूजा करने के बाद अपनी तलवार माता के दरबार में गलती से छोड़ आया जिसके कारण देवी रुष्ट हो गई और पाताल लोक का दरवाजा बैगा पुजारी के लिए हमेशा के लिए बंद हो गया। काफी मनौती के बाद भी जब देवी मां ने पाताल में आने की अनुमति नहीं दी, तब ऐसी स्थिति में उसी झील के किनारे नदी के बीचो-बीच पत्थरों से बने टापू पर सतलोकी माता का मंदिर स्थापित कर उनकी पूजा प्रारंभ की गई जो आज तक अनवरत चालू है। कहा जाता है कि बैगा पुजारी द्वारा देवी मां की पूजा के समय बलि देने की प्रथा थी जो समय के बदलाव के साथ भोले शंकर मंदिर निर्माण एवं शिवलिंग की स्थापना के बाद अब यह बली प्रथा बंद हो गई। अब महान नदी के उस पार हड़ही पहाड़ की गोद में आदिवासियों के पुजारी बैगा द्वारा स्थान बनाकर चैत्र नवरात्रि के समय जवारा रखने एवं आदिवासी परंपराओं के अनुसार देवी पूजा का विधान किया जाता है। किवदंतियां पुरखो और बुजुर्गों के माध्यम से पीढ़ी दर पीढ़ी आगे बताई जाने वाली वह कथाएं हैं जो लिखित दस्तावेज न होने के बाद भी नियमों और अनुष्ठानों की तरह नई पीढ़ी के लिए मान्यता प्राप्त होती हैं। समय के बदलाव के साथ किवदंतियों में कई बातें और जुड़ जाती हैं जो बहुत सत्य भले ही नहीं हो सकती, लेकिन किवदंतियां वैज्ञानिक शोध का आधार उपलब्ध कराती हैं और हमें सत्य की खोज के लिए प्रेरित करती है। महान नदी रेहड़ नदी की एक छोटी सहायक नदी है जो स्थानीय बुजुर्गों द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार मैनपाट के पहाड़ों से जुड़ी जशपुर के खुड़िया गांव के ढोढ़ी ( लकड़ी के पाटे से बांधा हुआ छोटे कुएं जैसा जल स्रोत) से निकलती है और आगे चलकर रेहण नदी में मिलकर उसकी जलधारा को समृद्ध करती है। यह वही रेहण नदी है जिस पर उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के पिंपरी स्थान पर रेहण डेम बना हुआ है जो जल विद्युत उत्पादन में पूरे देश में जल विद्युत उत्पादन की बड़ी इकाई में प्रमुख भूमिका निभाती है।
बनवासी भगवान श्रीराम का पड़ाव स्थल एवं संतों – मुनियों की तपस्थली का यह स्थान अपनी प्राकृतिक सौंदर्य का अद्भुत स्थल है। ऊंचाई पर बने इस मंदिर से महान नदी का बहाव देखना प्रकृति का ऐसा अनुभव है जो बिरले ही आपको कहीं दिखाई पड़ता होगा। पुजारी जी से प्राप्त जानकारी के अनुसार शिवरात्रि को यहां विशाल मेला लगता है जो अंचल के ग्रामीणों के एकत्रित रूप से आस्था स्थल तक पहुंचने और अपनी इच्छाओं को ईश्वर तक पहुंचाने का शुभ दिन बनकर हमारे पास पहुंचता है। आप भी अपनी इच्छा के अनुरूप भगवान शिव से कुछ मांगने और आशीर्वाद के लिए यहां पहुंच सकते हैं।
सतलोकी माता के मंदिर में आशीर्वाद प्राप्त करने तथा भगवान श्री राम और सीता के चरणों में नतमस्तक होने के लिए आपको राष्ट्रीय राजमार्ग क्र. 43 कटनी- गुमला मार्ग से अंबिकापुर, सूरजपुर या कोरिया जिले के मुख्यालय बैकुंठपुर पहुंचना होगा। कटनी मार्ग से यात्रा प्रारंभ करने पर बैकुंठपुर से 10 किलोमीटर आगे चलकर पटना पहुंचने के बाद छत्तीसगढ़ से राजमार्ग क्रमांक 12 पटना -भैयाथान- प्रतापपुर मार्ग में चलना होगा जो आगे आपको 40 किलोमीटर की दूरी पर भैयाथान होते हुए चंद्रामेढ़ा तक पहुंचा देगा। चंद्रामेढ़ा से पहले पलमा गांव में बांई ओर एक बोर्ड लगा हुआ है, जिसमें लिखा है “श्रीराम वन गमन मार्ग, राम जानकी मंदिर” 05 किलोमीटर। इसी मार्ग पर छत्तीसगढ़ राज्यमार्ग का हरा बोर्ड आपको प्रतापपुर, सारासोर,और भैयाथान, के रास्ते की जानकारी उपलब्ध कराता है। इसी मार्ग से आप सारासोर पहुंचकर महान नदी का प्राकृतिक सौंदर्य का दृश्य देख सकेंगे और एवं सतलोकी माता तथा राम जानकी मंदिर का आशीर्वाद प्राप्त कर सकेंगे। इस यात्रा में आप अथाह गहराई का वह स्थल भी देख पाएंगे जिसे पाताल लोक का द्वार कहा जाता है।
जिला मुख्यालय सूरजपुर से सारासोर जाने के लिए आपको भैयाथान पहुंचना होगा जो लगभग 35 किलोमीटर दूर है। यहां से आगे लगभग 17 किलोमीटर और आगे बढ़कर आप चंद्रामेढ़ा पहुंचने लगते हैं। चंद्रामेढ़ा पहुंचने से पूर्व अंतिम ग्राम पलमा गांव में लगे बोर्ड के अनुसार बांई ओर मुड़कर आप सारासोर पहुंच सकते हैं। संभाग मुख्यालय अंबिकापुर से आप बनारस रोड से यात्रा प्रारंभ कर आपको प्रतापपुर तक आना होगा। प्रतापपुर पहुंचने से पूर्व बांई ओर भैयाथान रोड मे मुड़कर लगभग 05 किलोमीटर की यात्रा करने के बाद आप चंद्रामेढ़ा के आगे अंतिम गांव पलमा पहुंच जाएंगे, जहां दाहिनी ओर लगे बोर्ड के अनुसार अपनी यात्रा कर सारासोर पहुंच सकते हैं, यह यात्रा अंबिकापुर से लगभग 65 किलोमीटर दूर होगी।
जंगलों और पहाड़ों के बीच बसे सारासोर और राम जानकी मंदिर के साथ साथ महान नदी द्वारा पहाड़ को काटकर अपने बहाव के लिए रास्ता बनाने का साहस ही उसे महान नाम से विभूषित करता है। यदि आप पहाड़ों, नदियों और प्राकृतिक दृश्य के पर्यटन के शौकीन है तब सच मानिए सारासोर पर्यटन में वह सबकुछ मौजूद है जो आप चाहते हैं। सारासोर के पहाड़ों की प्राकृतिक खूबसूरती और नदी के बहाव की खूबसूरत यादें आपको जीवन भर एक उपलब्धि परक यात्रा के रूप में हमेशा याद रहेंगी। ।
बस इतना ही फिर मिलेंगे किसी अगले पड़ाव पर
राजेश सिन्हा 8319654988








