एमसीबी जिले में नल है, टंकी है… बस पानी गुमशुदा है
एमसीबी | (विशेष व्यंग्य रिपोर्ट) केंद्र सरकार की महत्वाकांक्षी नल-जल योजना एमसीबी जिले में एक अनोखे प्रयोग के रूप में सामने आई है। यहां योजना का मकसद घर-घर पानी नहीं, बल्कि घर-घर उम्मीद पहुंचाना नज़र आ रहा है-जो अब सूख चुकी है।
योजना के तहत सबसे पहले गांव-गांव घरों में नल लगा दिए गए। ग्रामीणों ने सोचा, अब तो प्यास बुझने ही वाली है। लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि नल तो लगा है, पर पानी अब भी सरकारी फाइलों में ही बह रहा है।
व्यवस्था का कमाल देखिए-पहले नल, फिर टंकी, और पानी… शायद भविष्य में। होना तो यह चाहिए था कि पहले जलस्रोत सुनिश्चित किए जाते, फिर टंकी बनती और अंत में नल लगाए जाते। लेकिन एमसीबी मॉडल में क्रम उल्टा है—क्योंकि यहां प्राथमिकता पानी नहीं, कमीशन की धार है, जो बिना रुके बह रही है।
कुछ गिने-चुने गांव, जहां नदी या अन्य प्राकृतिक जलस्रोत मौजूद हैं, वहां किसी तरह पानी पहुंच भी गया है। लेकिन जिले के अधिकांश गांव आज भी नल से सिर्फ हवा और वादे ही पा रहे हैं।
उधर जिम्मेदार अधिकारी स्थिति की समीक्षा करने में व्यस्त हैं—कभी वीडियो कॉन्फ्रेंस में, कभी मीटिंग में। दफ्तर कम और स्क्रीन ज्यादा दिखाई दे रही है। ज़मीनी हकीकत तक पहुंचने का समय शायद 2028 के बाद मिलेगा।
केंद्र सरकार ने योजना का लक्ष्य वर्ष 2028 तक रखा है। अधिकारियों के लिए यह राहत की बात है—क्योंकि कहने को अभी “समय बाकी है।” लेकिन जिस रफ्तार और जिस दिशा में काम चल रहा है, उसे देखकर ग्रामीणों को भरोसा नहीं कि 2028 तक पानी आएगा या फिर नल-जल योजना एक नल-बिना-जल योजना बनकर रह जाएगी।
फिलहाल एमसीबी जिले में हालात यह हैं नल तैयार है, टंकी खड़ी है, अधिकारी मीटिंग में हैं… और जनता आज भी प्यास में है।
राजेश सिन्हा 8319654988
