“एक कर्मठ और समर्पित कर्मचारी संस्था क्यों छोड़ता है या अपना समर्पण क्यों छोड़ देता है?”- उपकार शर्मा
“किसी संस्था का सबसे कर्मठ कर्मचारी जब अचानक पहले जैसा काम करना बंद कर देता है, तो अक्सर मैनेजमेंट को केवल उसका बदला हुआ व्यवहार दिखाई देता है, लेकिन उसके पीछे वर्षों में जमा हुई उपेक्षा, अविश्वास, असमान व्यवहार या किसी निर्णायक घटना की कहानी छिपी हो सकती है।”
“एक कर्मठ और समर्पित कर्मचारी केवल नौकरी नहीं करता, वह संस्था को अपना समझकर काम करता है। इसलिए जब मैनेजमेंट के व्यवहार, निर्णय, अविश्वास, अन्याय, अपमान, पक्षपात या लगातार उपेक्षा के कारण उसका यह विश्वास टूटता है, तो वह पहले अपना अतिरिक्त प्रयास छोड़ता है, फिर अपना भावनात्मक समर्पण छोड़ता है और अंततः या तो संस्था छोड़ देता है अथवा संस्था में रहकर केवल अपने निर्धारित कर्तव्य तक सीमित हो जाता ह।”
कभी-कभी कर्मचारी काम नहीं छोड़ता, वह केवल अपना समर्पण छोड़ देता है। किसी भी संस्था की वास्तविक शक्ति केवल उसकी इमारत, मशीनों, तकनीक या नियमों में नहीं होती। उसकी सबसे बड़ी शक्ति वे कर्मठ व समर्पित कर्मचारी होते हैं, जो अपने काम को केवल नौकरी नही, बल्कि जिम्मेदारी समझकर करते हैं। ऐसे कर्मठ व समर्पित कर्मचारी समय की परवाह किए बिना काम करते हैं। उन्हें बार-बार कहने की आवश्यकता नहीं पड़ती। वे समस्या आने से पहले उसका समाधान खोजते हैं। वे संस्था की कमियों को अपनी समस्या समझते हैं। वे आवश्यकता पड़ने पर अपने निर्धारित दायित्व से आगे बढ़कर काम करते हैं। लेकिन कभी-कभी ऐसा कर्मठ व समर्पित कर्मचारी अचानक बदल जाता है। वह नौकरी नहीं छोड़ता। वह संस्था के विरुद्ध विद्रोह भी नहीं करता। वह केवल इतना करता है कि “अब मैं उतना ही करूँगा, जितना मेरे पद और वेतन के लिए आवश्यक है।” और मैनेजमेंट को अक्सर यह बदलाव बहुत देर से दिखाई देता है।
असल में कर्मचारी अचानक नहीं बदलता
किसी कर्मठ व समर्पित कर्मचारी का समर्पण सामान्यतः एक दिन में समाप्त नहीं होता। उसके भीतर कई छोटी-छोटी घटनाएँ जमा होती रहती हैं जैसे मेहनत की अनदेखी, अपेक्षा का बढ़ना, अन्याय का अनुभव, विश्वास में कमी, मन में चोट, भावनात्मक दूरी और अंततः समर्पण का समाप्त होना।
लेकिन कई बार कोई एक घटना उस जमा हुई निराशा का अंतिम बिंदु बन जाती है। वह घटना छोटी दिखाई दे सकती है, लेकिन कर्मचारी के लिए उसका अर्थ बहुत बड़ा होता है। वह मन ही मन कहता है कि “अगर मेरी ईमानदारी और वर्षों की मेहनत का यही परिणाम है, तो अब मुझे अपने बारे में सोचना चाहिए।
परिस्थितियाँ जो एक समर्पित कर्मचारी को भीतर से तोड़ सकती हैं
1. वर्षों की मेहनत के बाद किसी और को श्रेय मिल जाना
कर्मचारी ने किसी महत्वपूर्ण कार्य को पूरा करने के लिए अतिरिक्त समय दिया। उसने योजना बनाई, समस्याएँ सुलझाईं और परिणाम दिया। लेकिन मैनेजमेंट ने प्रशंसा 2/5 द्वारे व्यक्ति की कर दी। कर्मचारी के मन में आना स्वभाविक है कि “काम मैंने किया, जिम्मेदारी मैने उठाई और जब परिणाम मिला तो श्रेय किसी और को?” पहली बार उसे महसूस होता है कि मेहनत और पहचान के बीच कोई संबंध नहीं है।
2. एक गलती पर वर्षों की ईमानदारी भूल जाना
कर्मचारी वर्षों से ईमानदारी और जिम्मेदारी से काम कर रहा है। एक दिन उससे एक छाटी सी भूल या गलती हो जाती और मैनेजमेंट उसकी पूरी सेवा को भूलकर केवल उस भूल या गलती को आधार बना देता है। अब कर्मचारी के मन में आता है कि “इतने वर्षों में मैंने जो कुछ अच्छा किया, उसका कोई मूल्य नहीं था? मेरी एक गलती ही मेरी पूरी पहचान बन गई?” यह घटना उसके भीतर के समर्पण की भावना को चोट पहुँचा सकती है।
3. सबके सामने अपमानित करना
भूल या गलती या कोई कारण हुई या बनी, लेकिन मैनेजमेंट ने उसे अकेले बुलाकर भूल या गलती को समझाने या कारण को जानने के बजाय सभी के सामने उसे गुनहगार बना दिया। इस स्थित में कर्मचारी के मन में आयेगा ही कि “भूल, गलती या कोई कारण मेरी हो सकती है, लेकिन क्या मेरा सम्मान भी छीन लिया जाना चाहिए?” एक कर्मठ कर्मचारी आलोचना सह सकता है, लेकिन अपमान को हमेशा स्वीकार नहीं कर पाता।
4. कम मेहनत करने वाले को अधिक महत्व मिलना
एक कर्मचारी नियमित रूप से जिम्मेदारी निभाता है, जबकि दूसरा व्यक्ति अपेक्षाकृत कम योगदान देता है। फिर भी दूसरे व्यक्ति को अधिक सुविधा, प्रशंसा या अवसर मिल जाता है। अब कर्मचारी के मन ही मन सोचता है कि “क्या यहाँ मेहनत से अधिक महत्व किसी और चीज का है?” ओर यहीं से प्रेरणा का क्षरण शुरू हो सकता है।
5. पक्षपात का स्पष्ट अनुभव
जब कर्मचारी को लगता है कि निर्णय योग्यता और प्रदर्शन के आधार पर नहीं, बल्कि व्यक्तिगत पसंद-नापसंद के आधार पर लिए जा रहे हैं। कर्मचारी के महसूस करता है कि “जब निर्णय पहले से तय हैं, तो म अपनी क्षमता साबित करने के लिए इतना प्रयास क्यों करूँ?” यह स्थिति कर्मचारी के विश्वास को कमजोर करती है।
6. अतिरिक्त जिम्मेदारी को अधिकार समझ लेना
एक कर्मठ और समर्पित कर्मचारी हमेशा अतिरिक्त काम कर देता है। धीरे-धीरे मैनेजमेंट की अपेक्षा बन जाती है कि “यह तो कर ही देगा।” लेकिन अतिरिक्त जिम्मेदारी के बदले न धन्यवाद, न मान्यता, न अवसर। कर्मचारी को लगने लगता है कि “मेरी क्षमता मेरी पहचान नहीं रही, अब वह केवल अतिरिक्त काम करवाने का साधन बन गई है।” यहीं से समर्पण शोषण जैसा महसूस होने लगता है।
7. मैनेजमेंट का अपना वादा बदल देना
मैनेजमेंट ने किसो कर्मचारी से कोई आश्वासन दिया हो चाहे वह पदोन्नति, जिम्मेदारी, वेतन, सुविधा या किसी अन्य विषय में और कर्मचारी ने उस भरोसे पर अतिरिक्त मेहनत की। लेकिन बाद में मैनेजमेंट बिना उचित संवाद के अपना निर्णय बदल देता है। इस स्थिति में कर्मचारी यह धारणा बनाने लगता है कि लोगों ने कहा था, मैनेजमेंट की बात पर भरोसा ही नहीं किया जा सकता, और मैं उन्हें गलत समझता रहा पर यह सच है मैनेजमेंट भरोस के लायक नहीं।” यह घटना विश्वास की नींव हिला सकती है।
8. संस्था के हित में सच बोलने पर ही गलत ठहरा दिया जाना
किसी समस्या की ओर मैनेजमेंट का ध्यान आकर्षित कराता है। उसका उद्देश्य संस्था को नुकसान पहुँचाना नहीं, बल्कि सुधार करना था। लेकिन मैनेजमेंट उसे ही नकारात्मक, असहयोगी या शिकायत करने वाला व्यक्ति समझ लेता है। कर्मचारी यह सोच लेता है कि “जब समस्या बताना ही गलत है, तो अगली बार मैं चुप रहूँगा।” और अगली बार वह सचमुच चुप रहता है। इस स्थित में संस्था एक कर्मचारी की आवाज नहीं, बल्कि अपनी एक सुधार प्रणाली को खो दती है।
9. निर्णय लेने में अनुभव की पूरी तरह अनदेखी
कर्मचारी वर्षों से किसी कार्य को कर रहा है। उसे उस काम की जमीनी कठिनाइयों का अनुभव है। लेकिन बिना उससे चर्चा किए कोई ऐसा निर्णय लिया जाता है जिससे काम और कठिन हो जाता है। तब कर्मचारी के मन ही मन यह धारणा बना लेता है कि “जब मेरे अनुभव की आवश्यकता ही नहीं है, तो मेरी जिम्मेदारी भी केवल आदेश मानने तक ही क्यों न रहे?” यहीं से एक कर्मठ और समर्पित कर्मचारी की कर्मठता और समर्पण में भी कमो आन लगती है।
10. विश्वास के स्थान पर संदेह
किसी अफवाह, शिकायत या गलतफहमी के आधार पर मैनेजमेंट कर्मचारी से सवाल करता है। कर्मचारी अपनी सफाई देता है, कई-कई बार तो मैनेजमेंट कुछ पूछता भी नहीं और उस कर्मठ व समर्पित कर्मचारी की वर्षों की विश्वसनीयता को महत्व नहीं मिलता। ऐसी स्थिति में कर्मचारी के मन मे यह विचार आना स्वभाविक हो जाता है कि “जिसे मैंने वर्षों में बनाया, वह विश्वास एक अफवाह, शिकायत या गलतफहमी से लगे निराधार आरोप के कारण समाप्त हो गया?” इसके बाद कर्मचारी काम तो करता है, लेकिन पहले जैसी निष्ठा शायद नहीं रह जाती है।
11. जरूरत के समय कर्मचारी का साथ न देना
कर्मचारी वर्षों तक संस्था के लिए उपलब्ध रहा। लेकिन जब उसे किसी महत्वपूर्ण अवसर पर मैनेजमेंट के समर्थन की आवश्यकता पड़ी, तो उसे नियमों का हवाला दे कर अकेला छोड़ दिया गया। कर्मचारी को लगता है कि “जब संस्था को मेरी जरूरत थी, मैं हमेशा खड़ा रहा और जब मुझे संस्था की जरूरत थी, तब मुझे अकेला छोड़ दिया गया।” यह अनुभव बहुत गहरी भावनात्मक दूरी पैदा कर देती है।
12. हर बार ‘और करो’, लेकिन कभी ‘अच्छा किया’ नहीं कहा-
कई संस्थाएँ या मैनेजमेंट केवल अपेक्षाएँ बढ़ाते रहते हैं। काम पूरा हुआ, “अब यह भी कर दो।” लक्ष्य पूरा हुआ, “अगला लक्ष्य इतना होना चाहिए।” समस्या हल हुई, “यह तो तुम्हारा काम था।” लेकिन शायद ही कभी कहा गया कि “तुमने बहुत अच्छा काम किया।” कर्मचारी को लगता है कि “क्या मेरी मेहनत कभी पर्याप्त या पूर्ण भी होगी?” कर्मचारी केवल वेतन से नहीं, मान्यता और सम्मान से भी प्रेरित होता है।
13. कर्मचारी की निष्ठा का गलत अर्थ निकालना
कर्मठ व समर्पित कर्मचारी संस्था के प्रति वफादार है, इसलिए मैनेजमेंट मान लेता है कि वह किसी भी परिस्थिति में काम करता रहेगा। यही सोच खतरनाक है। कर्मचारी को लगने लगता ह कि ” संस्था मेरी निष्ठा को मेरी मजबूरी समझ रही है।” मैनेजमेंट को याद रखना चाहिए कि कर्मचारी का यह समर्पण उसकी कमजोरी नहीं होतो।
14. वह एक घटना जहाँ कर्मचारी को पहली बार लगा कि, ‘यह मेरी संस्था नहीं है’
कभी-कभी कोई बड़ा अपमान नहीं होता, न कोई बड़ी बहस, न कोई इस्तीफा, बस एक निर्णय होता है। मैनेजमट ऐसा निर्णय लेता है जिसमें कर्मचारी को पहली बार महसूस होता है कि, “यहाँ मेरी मेहनत, मेरी निष्ठा और मेरे वर्षों के योगदान का वह मूल्य नहीं है, जिसे मैं समझता था।” यही क्षण निर्णायक स्थिति हो सकतो है। कर्मचारी ठगा सा महसूस करते हुए सोचता है कि “मैंने इस संस्था को अपना समझकर काम किया था। शायद संस्था ने मुझे कभी अपना माना ही नहीं।” और उसी दिन कर्मचारी के व्यवहार में एक अदृश्य परिवर्तन शुरू हो जाता है।
कर्मठ और समर्पित कर्मचारी नौकरी नहीं छोड़ता, वह ‘अपना अतिरिक्त प्रयास’ छोड़ देता है ओर यहो सबसे महत्वपूर्ण बात होती है। क्योंकि वह कर्मचारी पहले की तरह आएगा, समय पर काम भी करेगा, निर्देशों को मानेगा भी और वेतन भी लेगा। लेकिन अब वह…… अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं लेगा, बिना कहे समस्या नहीं सुलझाएगा, नए सुझाव नहीं देगा, अतिरिक्त समय देने से बचेगा, संस्था की समस्या को अपनी समस्या नहीं मानेगा, गलती देखकर स्वयं आगे नहीं आएगा और हर काम में पूछेगा कि “क्या यह मेरे दायित्व में है?”
मैनेजमेंट कह सकता है…. “पहले यह कर्मचारी कितना अच्छा था, अब बदल गया है।” और कमचारी के भीतर शायद यह होगा कि, “मैं बदला नहीं हूँ। मैंने केवल उतना ही देना शुरू किया है, जितना और जैसा मुझे आपसे मिलता है।”
मैनेजमेंट के लिए सबसे बड़ा सबक
कर्मठ और समर्पित कर्मचारी को केवल वेतन देकर नहीं बाँधा जा सकता, क्योंकि उसकी कर्मठता और समर्पण को आप अपने वेतन से खरीद नहीं सकते ह और आप जो वेतन देते हैं उसकी कर्मठता और समर्पण की तुलना में बहुत ही कम होता है, वेतन से सिर्फ आप एक साधारण कर्मचारी को काम पर ला सकते है, लेकिन कर्मठ व समर्पित कर्मचारी को सम्मान जोड़ता है, विश्वास उसे जिम्मेदार बनाता है, न्याय उसे प्रेरित करता है, मान्यता उसे अतिरिक्त प्रयास के लिए तैयार करती है। इसलिए संस्था या मैनेजमेंट को यह समझना चाहिए कि एक समर्पित कर्मचारी की सबसे बड़ी पूँजी उसका विश्वास है। वेतन में वृद्धि करके कभी-कभीअसंतोष कम किया जा सकता है, लेकिन यदि सम्मान और विश्वास टूट गया, तो केवल पैसा हमेशा उस नुकसान की भरपाई नहीं कर पाता।
अंतिम बात
संस्था को छोड़ने वाला कर्मठ व समर्पित कर्मचारी तो दिखाई देता है, लेकिन संस्था के भीतर रहकर अपना समर्पण छोड़ देने वाला कर्मठ कर्मचारी अक्सर दिखाई नहीं देता। वह सबसे खतरनाक स्थिति होती है।
क्योंकि इस्तीफा देने वाला कर्मचारी चला जाता है और उसकी जगह नया व्यक्ति आ सकता है। लेकिन मैनेजमेंट के व्यवहार या व्यवस्था से वह टूट चुका कर्मठ व समर्पित कर्मचारी संस्था में रहकर केवल न्यूनतम आवश्यक काम करने लगता है, उसके भीतर वर्षों का अनुभव तो रहता है, लेकिन वह अनुभव अब संस्था के विकास में पहले जैसी ऊर्जा से नहीं लगता।
इसलिए किसी भी मैनेजमेंट को समय-समय पर अपने आप से तीन प्रश्न अवश्य पूछने चाहिए,
क्या हम अपने अच्छे कर्मचारियों की मेहनत को पहचानते हैं?
क्या हमारे नियम और व्यवहार सभी के लिए समान हैं?
क्या हमारे निर्णय कर्मचारियों का विश्वास बढ़ाते हैं या घटाते हैं?
क्योंकि कभी-कभी किसी कर्मठ व समर्पित कर्मचारी का उत्साह किसी बड़ी वजह से नहीं मरता। एक छोटा-सा निर्णय, एक अनुचित व्यवहार, एक अपमानजनक वाक्य या एक टूटा हुआ वादा, वर्षों के समर्पण पर भारी पड़ सकता है। इसलिए मैनेजमेंट को चाहिए कि अपनी संस्था के साधारण और कर्मठ व समर्पित कर्मचारी को पहचाने और उसकी कर्मठता और समर्पण का उचित मूल्य व सम्मान उसे प्रदान करें। क्योंकि किसी भो संस्था के सफल संचालन में सैकड़ों कर्मचारियों की भीड़ वेतन के आधार पर जो काम करने का दिखावा करती है एक कर्मठ व समर्पित कर्मचारी यह जानते हुए भी कि आपके द्वारा उसे दिया जाने वाला वेतन उसकी कर्मठता और समर्पण के आगे कुछ भी नहीं फिर भी आपकी संस्था के प्रति पूरी तरह समर्पित होकर लगन के साथ कार्य करता रहता है जो कि किसी संस्था को दिखाई नहीं देती।
एक कर्मठ और समर्पित कर्मचारी किसी लालच या स्वार्थ से कार्य नहीं करता वह दिल लगा कर दिल से कार्य करता है और जब मैनेजमेंट के निराधार आरोपों या हरकतों का शिकार होता है तो वह दिल से टूट जाता है और संस्था को छोड़ देता है यदि वह संस्था को ना भी छोड़ पाये तो अंत में कर्मचारी के मन में केवल एक वाक्य रह जाता है, “मैंने अपना सर्वश्रेष्ठ दिया था, अब मैं केवल अपना कर्तव्य निभाऊँगा।” यही वह क्षण है, जब एक कर्मठ कर्मचारी संस्था से नहीं, बल्कि संस्था के प्रति अपने भावनात्मक समर्पण से दूर हो जाता है।
